Sunday, 23 October 2016

रात पसरी

रात पसरी है मगर तारे जगे बैठे हैं
देख तो, सुबह के हरकारे जगे बैठे हैं ।
हाँ,आतंक का सन्नाटा नगर पर काबिज़
पर दीवारों पे सुर्ख़ नारे जगे बैठे हैं ।
इधर अलावों में कुछ आग बचाने वाले
रौशनी के कई रखवारे जगे बैठे हैं ।
वक़्त आसां नहीं जो चैन से सो लेगा ' कमल'
तेरी चौखट पे भी हत्यारे जगे बैठे हैं ।
----- आदित्य कमल

Friday, 7 October 2016

चिराग था...फितरत से, जलता रहा.

क्रांतिकारी व्यक्तित्वों को समर्पित
जिस राह पर ....हर बार मुझे,
अपना कोई.....छलता रहा !
फिर भी ....न जाने क्यों मै,
उस राह ही....चलता रहा !
सोचा बहुत....इस बार,
रोशनी नहीं....धुआं दूंगा...
लेकिन चिराग था...फितरत से,
जलता रहा...जलता रहा !!!