Monday, 9 October 2017

बाज़ार जल रहा है या मेहनतकश मर रहा है?

बाज़ार जल रहा है,
मुनाफा घट रहा है.
सामान सड रहा है,
खरीददार लुट रहे हैं.

पूंजी के चाकर, मैनेजर बेचैन हैं,
अर्थशास्त्री उपाय ढूंड रहे हैं,
अँधेरा है, भूख है, मौत है,
पर कौन मर रहा है?

माल है, अनाज है,
बहुत है पर घुन खा रहे है,
और मेहनतकश मर रहे हैं,
धन पैदा करने वाले ही मर रहे हैं.

फैक्टरी बंद हो रहे हैं,
रोजगार ख़त्म हो रहे हैं,
पैसे पर दल्ले नाच रहे हैं,
मिडिया को "विकास" नजर आ रहा है.

बाज़ार जल रहा है,
पर कौन मर रहा है.
बाल मजदूर मर रहा है,
ठेलेवाले, किसान मर रहे हैं.

नोटबंदी और और जीएसटी आ चूका है,
बड़े पूंजीपति, वित्त मालिक
और "राजकुमार" आबाद हो रहे हैं,
छोटे, मझौले व्यापारी बर्बाद हो रहे हैं!

बाज़ार जल रहा है,
पर पूंजी का विकास हो रहा है,
कौन मर रहा है,
मेहनतकश मर रहा है!

उठो, अभी मरने का वक्त नहीं,
मारनेवालों को मारो!
क्रांति का बिगुल बज चूका है,
दुश्मनों के कब्र खोदो!

अब और नहीं, अब बिलकुल नहीं,
आज नहीं तो कभी नहीं,
हत्यारों को ख़त्म करो,
सत्ता से बेदखल करो!

इतिहास बनाने वाले हो,
इतिहास बदल डालो,
बाज़ार को जला डालो,
खुद की सत्ता बना डालो!

Friday, 6 October 2017

Ballads of Lenin: Langston Hughes


Comrade Lenin of Russia,
High in a marble tomb,
Move over, Comrade Lenin,
And give me room.
I am Ivan, the peasant,
Boots all muddy with soil.
I fought with you, Comrade Lenin.
Now I have finished my toil.
Comrade Lenin of Russia,
Alive in a marble tomb,
Move over, Comrade Lenin,
And make me room.
I am Chico, the Negro,
Cutting cane in the sun.
I lived for you, Comrade Lenin.
Now my work is done.
Comrade Lenin of Russia,
Honored in a marble tomb,
Move over, Comrade Lenin,
And leave me room.
I am Chang from the foundries
On strike in the streets of Shanghai.
For the sake of the Revolution
I fight, I starve, I die.
Comrade Lenin of Russia
Speaks from the marble tomb:
On guard with the workers forever —
The world is our room!

Wednesday, 4 October 2017

मुनसिफ़ मेरा क़ातिल निकला!

फेस बुक के एक साथी से. खालिद जामा नाम है उनका. गौर फरमाए:                              

सारी उम्र किताबें पढ़ कर इल्म तो हासिल कर डाला |
अमल की दुनिया मे जब हम निकले तो हमसे बेहतर जाहिल निकला ||                                                                          
जब बेगुनाह को फाँसी हो गई तब जा के यह राज़ खुला |
जिस मुनसिफ़ ने सज़ा लिखी थी वह मुनसिफ़ मेरा क़ातिल निकला ||

(मुनसिफ मतलब जज)

Tuesday, 3 October 2017

भिखमंगे या अपहरनकर्ता?

एनजीओ की राजनीति पर केन्द्रित एक शानदार कविता

भिखमंगे!
- मनबहकी लाल

भिखमंगे आये
नवयुग का मसीहा बनकर,
लोगों को अज्ञान, अशिक्षा और निर्धनता से मुक्ति दिलाने ।
अद्भुत वक्तृता, लेखन–कौशल और
सांगठनिक क्षमता से लैस
स्वस्थ–सुदर्शन–सुसंस्कृत भिखमंगे आये
हमारी बस्ती में ।
एशिया–अफ्रीका–लातिनी अमेरिका के
तमाम गरीबों के बीच
जिस तरह पहुंचे वे यानों और
वाहनों पर सवार,
उसी तरह आये वे हमारे बीच ।
भीख, दया, समर्पण और भय की
संस्कृति के प्रचारक
पुराने मिशनरियों से वे अलग थे,
जैसे कि उनके दाता भी भिन्न थे
अपने पूर्वजों से ।
अलग थे वे उन सर्वोदयी याचकों से भी
जिनके गांधीवादी जांघिये में
पड़ा रहता था
(और आज भी पड़ा रहता है)
विदेशी अनुदान का नाड़ा ।

भिखमंगे आये
अलग–अलग टोलियों में ।
कुछ ने अपने पश्चिमी वैभवशाली दाताओं की महिमा बखानी,
तो कुछ का दावा था कि वे
लुटेरों को उल्लू बनाकर
रकम ऐंठ लाये हैं
जनहित के लिए और
जनक्रान्ति की तैयारी के लिए
कुछ का कहना था कि
क्रान्ति की तैयारियों का भारी बोझ
न पड़े इस देश की गरीब जनता पर
इसलिए उन्होंने भीख से
संसाधन जुटाने का नायाब तरीका अपनाया है ।
कुछ का कहना था
कि क्रान्ति अभी बहुत दूर है
इसलिए वे तब तक कुछ सुधार ही
कर लेना चाहते हैं,
संवार देना चाहते हैं
दलितों–शोषितों–वंचितों का जीवन
एक हद तक
और फीस के तौर पर, बिना नेता–नौकरशाह
बनने का पाप किये,
खुद भी जुटा लेना चाहते हैं
घर, गाड़ी वगैरह कुछ अदना–सी चीजें
और अगर खुद वे आ गये हैं
जनता की खातिर इस नर्क जैसे देश में
तो क्या इतना भी चाहना अनुचित है
कि उनके बेटे–बेटी शिक्षा पायें
अमरीका में
कुछ का कहना था कि
अशिक्षा ही हमारे दुर्भाग्य का मूल है
अत: वे हमें शिक्षित करने आये हैं,
स्वास्थ्य और परिवार–नियोजन के बारे में
बताने आये हैं ।
कुछ का कहना था कि
हम सहकारी संस्था बनाकर
उत्पादन करें
तो हल हो जायेंगी हमारी
सारी दिक्कतें ।
कुछ ने कहा कि
जो ट्रेड–यूनियनें न कर सकीं,
वे वह कर दिखायेंगे,
राज्यसत्ता तो चांद मांगना है,
वे हमें चवन्नी–अठन्नी के लिए
नये सिरे से लड़ना सिखायेंगे ।
कुछ ने कहा कि दोष
कोर्ट–कचहरी–कानून और
सरकार का नहीं
हमारे गंवारपन का है
अत: वे हमें हमारे अधिकारों,
संविधान और श्रम–कानूनों के बारे में
पढ़ायेंगे
और जब हम जान जायेंगे कि
हमें सरकार से क्या मांगना है
तो हम मांगेंगे एक स्वर से
और हमारी याचना के तुमुलनाद
से जागकर, डरकर,
सरकार हमें दे देगी वह सब कुछ
जो हम चाहेंगे ।

भिखमंगों ने हमें लताड़ा
कि यदि सरकार अपनी जिम्मेदारियां
पूरी नहीं करती
तो हम उसका मुंह क्यों जोहते हैं
यदि वह नौकरियां नहीं देती
तो हम खुद क्यों नहीं कर लेते
कुछ काम–धाम
यदि वह सभी कारखानों को
पूंजीपतियों को दे रही है
और पूंजीपति हमें रोजगार नहीं दे रहे
तो हम स्वयं मिलकर क्यों नहीं
शुरू कर लेते कोई उद्यम
और फिर भी नहीं चलता काम
तो कम क्यों नहीं कर लेते
अपनी जरूरतें
बन्द क्यों नहीं कर देते
ऊपर की ओर देखना
चरम पर्यावरणवादी बन
चले क्यों नहीं जाते
प्रकृति की गोद में निवास करने

भिखमंगों ने बेरोजगार युवाओं से
कहा-“तुम हमारे पास आओ,
हम तुम्हें जनता की सेवा करना सिखायेंगे,
वेतन कम देंगे
पर गुजारा–भत्ता से बेहतर होगा
और उसकी भरपाई के लिए
‘जनता के आदमी’ का
ओहदा दिलायेंगे,
स्थायी नौकरी न सही,
बिना किसी जोखिम के
क्रान्तिकारी बनायेंगे,
मजबूरी के त्याग का वाजिब
मोल दिलायेंगे ।”
“रिटायर्ड, निराश, थके हुए क्रान्तिकारियो,
आओ, हम तुम्हें स्वर्ग का रास्ता बतायेंगे ।
वामपंथी विद्वानो, आओ
आओ सबआल्टर्न वालो,
आओ तमाम उत्तर मार्क्सवादियो,
उत्तर नारीवादियो वगैरह–वगैरह
आओ, अपने ज्ञान और अनुभव से
एन.जी.ओ. दर्शन के नये–नये शस्त्र और शास्त्र रचो,”
आह्वान किया भिखमंगों ने
और जुट गये दाता–एजेंसियों के लिए
नई रिपोर्ट तैयार करने में ।

भिखमंगों ने भीख को नई गरिमा दी,
भूमण्डलीकरण के दौर में
उसे अन्तरराष्ट्रीय प्रतिष्ठा दी ।
भिखमंगों ने क्रान्ति और बदलाव की
नई परिभाषाएं रचीं ।
भिखमंगों ने कहा-“भूल जाओ
‘पैबन्द और कुर्ते का गीत’ ¹
वह पुराना पड़ चुका है ।
हम मांगकर लाते रहेंगे तुम्हारे लिए पैबन्द
तुम उन्हें सहेजना,
उन्हें जोड़कर एक दिन तैयार हो जायेगा
एक पूरा का पूरा कुर्ता ।
भूख से तड़पते हुए मर जाओगे
यदि समूची रोटी चाहोगे ।
हम तुम्हारे लिए मांगकर लाते रहेंगे
रोटी के छोटे–छोटे टुकड़े,
तुम उन्हें खाते जाओ
एक दिन तुम्हारे पेट में होगी
एक साबुत रोटी ।
मत करो बातें सारे कारखाने
और कोयला और खनिज और
मुल्क की हुकूमत पर कब्जे की,
ऐसी कोशिशें असफल हो चुकीं ।”
हम पूछते हैं व्यग्र होकर,
“आखिर कब तक चलेगा
इस तरह”
वह तर्जनी उठाकर हमें रोकते हैं,
“हम एक अर्जी लिख रहे हैं ।”
फिर वे एक रिपोर्ट लिखते हैं,
फिर चिन्तन करते हैं,
फिर दौरा करने किसी और दिशा में
चल देते हैं ।
हम पाते हैं, भिखमंगे नहीं वे
अपहरणकर्ता हैं
बदलाव के विचारों के, स्वप्नों और आशाओं के ।
आत्मा की ऊष्मा के खिलाफ
सतत सक्रिय
शीत की लहर हैं ये भिखमंगे ।

¹ ‘पैबन्द और कुर्ते का गीत’-ब्रेष्ट की प्रसिद्ध कविता का संदर्भ
___________

Satya Narayan की वॉल से