Friday, 23 December 2016

पूंजीवाद : एक डायन!!!

धरती के चप्पे-चप्पे को बाज़ार बनाती है
हर संबंधों को सिक्कों का व्यापार बनाती है
बस्ती-बस्ती में ज़हरीली दीवार बनाती है
आबादी का जीना-मरना दुश्वार बनाती है
यह कैसी डायन बैठी है दुनिया की छाती पर
जो पाठ शांति का करते हुए हथियार बनाती है
--------आदित्य कमल

Tuesday, 20 December 2016

मेरा नाम, जाति और धर्म

मेरे नाम, जाति और धर्म को लेकर कुछ लोगो को जिज्ञासा रहती है.
बता देता हूँ, मेरा धर्म और जाति वही है ,
जिससे तुम नफरत करते हो ।
जब तुम भंगी से नफरत करते हो,
तो मुझे लगता है मै भंगी हूँ,
जब तुम चमार नफरत करते हो तो ,
मुझे लगता है मै चमार हूँ, 
जब तुम जाट से नफरत करते हो तो,
मुझे लगता है मैं जाट हूं ,
जब तुम मुस्लिम से नफरत करते हो तो ,
मुझे लगता है मै मुस्लिम हूँ, 
जब तुम हिन्दू से नफरत करते हो तो ,
मुझे लगता है मैं हिन्दू हूं, ।
जब तुम सरदारों से नफरत करते हो तो ,
मुझे लगता है मैं सरदार हूं ।
जब तुम ईसाई से नफरत करते हो तो,
मुझे लगता है मैं ईसाई हूँ.. 
जब तुम किसान से नफरत करते हो तो,
मुझे लगता है मैं किसान हूं ।
तुम आरक्षण से नफरत करते हो तो ,
मै आरक्षित हूँ, तुम अशिक्षितों से नफरत करते हो तो मै अशिक्षित हूँ ....
मै हर वो इंसान हूँ जिससे तुमको नफरत है, जिसे तुम मिटाना चाहते हो या जिसको डराकर या दबाकर उसका शोषण करना चाहते हो।
मै इंसान हूँ, उसी से तो तुमको सबसे ज्यादा नफरत है ना।

Thursday, 15 December 2016

समाजवाद खुद चलकर आपके पास आ जायेगा: इस धोखे में मत रहना!

आहों से पत्थर पिंघलेगा ,
इस धोखे मे मत. रहना !
तुम्हें कहीं इन्साफ मिलेगा
इस धोखे मै मत रहना !!
भारत जर्रे जर्रे मै ,
सबका अपना हिस्सा है !
बुला कर कोई देगा,
इस धोखे मै मत रहना !!
कहा किसी ने तेरे भाग्य में ,
धन दौलत. की रेखा है !
छप्पर फाड़ के धन बरसेगा ,,
इस धोखे मै मत रहना !!
भाग्य और भगवान तो प्यारे ,
केवल एक छलावा है !
ईश्वर ही कल्याण करेगा,
इस धोखे में मत रहना !!
अगर अधिकार चाहते हो तो साथ में आ जाओ,
ब्राह्मण (मनुवादी) कभी सुधरेगा,
इस धोखे में मत रहना !!

(फेस बुक पर से! शकुन्तला बौद्ध निडर द्वारा)
"सडा गला पूंजीवाद अपने आप ख़त्म हो जायेगा,
समाजवाद खुद चलकर आपके पास आ जायेगा,
इस धोखे में मत रहना!"

Friday, 9 December 2016

धरा को उठाओ, गगन को झुकाओ

दिए से मिटेगा न मन का अँधेरा,
धरा को उठाओ, गगन को झुकाओ !

बहुत बार आई-गई यह दिवाली
मगर तम जहाँ था वहीं पर खड़ा है,
बहुत बार लौ जल-बुझी पर अभी तक
कफन रात का हर चमन पर पड़ा है,
न फिर सूर्य रूठे, न फिर स्वप्न टूटे
ऊषा को जगाओ, निशा को सुलाओ !
दिए से मिटेगा न मन का अँधेरा
धरा को उठाओ, गगन को झुकाओ ! 
सृजन शांति के वास्ते है जरूरी
कि हर द्वार पर रोशनी गीत गाए
तभी मुक्ति का यज्ञ यह पूर्ण होगा,
कि जब प्यार तलवार से जीत जाए,
घृणा बढ़ रही है, अमा चढ़ रही है,
मनुज को जिलाओ, दनुज को मिटाओ!
दिए से मिटेगा... Read more at: http://hindi.webdunia.com/gopal-das-neeraj/%E0%A4%A7%E0%A4%B0%E0%A4%BE-%E0%A4%95%E0%A5%8B-%E0%A4%89%E0%A4%A0%E0%A4%BE%E0%A4%93-%E0%A4%97%E0%A4%97%E0%A4%A8-%E0%A4%95%E0%A5%8B-%E0%A4%9D%E0%A5%81%E0%A4%95%E0%A4%BE%E0%A4%93-108011700075_1.htm

Sunday, 27 November 2016

हम जिन्दा हैं!

जिन्दा हैं फिदेल 
चे भी और हो ची मिन्ह भी
माओ भी, स्टालिन भी
जिन्दा हैं लेनिन भी 
मार्क्स और एंगेल्स भी
मोर्गन और डार्विन भी जिन्दा हैं
वे तमाम लोग जिन्दा हैं
जिन्हों ने मनुष्य जाति की
प्रगति के पथ पर नए सोपान रचे हैं
तुम पूछोगे वे जिन्दा हैं तो कहाँ हैं
वे मेरे भीतर जिन्दा हैं,
वे हर मेहनतकश में जिन्दा हैं
वे जिन्दा रहेंगे तब तक
जब तक जीवित है मनुष्य जाति
जब तक जीवित है मनुष्य जाति का इतिहास
---- दिनेशराय द्विवेदी

Wednesday, 16 November 2016

बेर्टोल्ट ब्रेष्ट की कविता – हम राज करें, तुम राम भजो!

बेर्टोल्ट ब्रेष्ट की कविता – हम राज करें, तुम राम भजो!

खाने की टेबुल पर जिनके
पकवानों की रेलमपेल
वे पाठ पढ़ाते हैं हमको
‘सन्तोष करो, सन्तोष करो!’
उनके धन्‍धों की ख़ातिर
हम पेट काटकर टैक्स भरें
और नसीहत सुनते जायें –
‘त्याग करो, भई त्याग करो!’
मोटी-मोटी तोंदों को जो
ठूँस-ठूँसकर भरे हुए
हम भूखों को सीख सिखाते –
‘सपने देखो, धीर धरो!’
बेड़ा ग़र्क़ देश का करके
हमको शिक्षा देते हैं -
‘तेरे बस की बात नहीं
हम राज करें, तुम राम भजो!’
(इस कविता का मनबहकी लाल ने अपने निराले अन्दाल में अनुवाद किया है।)
कविता परिकल्पना प्रकाशन से प्रकाशित पुस्‍तक ‘कहे मनबहकी खरी-खरी’ से ली गयी है।

Monday, 14 November 2016

व्लादिमीर मायकोवस्की की कविता- तुम


maykovasky
तुम, जो व्याभिचार के कीचड़ में लगातार लोट रहे हो,
गरम गुसलखाने और आरामदायक शौचालय के मालिक!
तुम्हारी मजाल कि अपनी चुन्धियायी आँखों से पढ़ो
अखबार में छपी सेंट जोर्ज पदक दिये जाने जैसी खबर!
तुमको परवाह भी है, उन बेशुमार मामूली लोगों की
जिन्हें चिंता है कि वे कैसे पूरी करते रहे तुम्हारी हवश,
कि शायद अभी-अभी लेफ्टिनेंट पेत्रोव की दोनों टांगें
उड़ गयीं हैं बम के धमाके से?
कल्पना करो कि अगर वह, जिसे बलि देने के लिये लाया गया,
अपने खून से लतपथ टांगे लिये आये और अचानक देख ले,
कि वोदका और सोडा-वाटर गटकते अपने पियक्कड थोबड़े से
गुनगुना रहे हो तुम सेवेरियाती का कामुक गीत!
औरतों की देह, मुर्ग-मुसल्लम और मोटर गाड़ियों के पीछे पागल
तुम्हारे जैसे अय्याश लोगों के लिये, मैं अपनी जान दे दूँ?
इससे लाख दर्जे अच्छा है कि मास्को के भटियारखाने में जाकर
वहाँ रंडियों को शरबत पिलाने के काम में लग जाऊं.
(अनुवाद- दिगम्बर)

Wednesday, 2 November 2016

हिटलर के तम्बू में!

अब तक छिपे हुए थे उनके दाँत और नाख़ून ।
संस्कृति की भट्ठी में कच्चा गोश्त रहे थे भून ।
छाँट रहे थे अब तक बस वे बड़े-बड़े क़ानून ।
नहीं किसी को दिखता था दूधिया वस्‍त्र पर ख़ून ।
अब तक छिपे हुए थे उनके दाँत और नाख़ून ।
संस्कृति की भट्ठी में कच्चा गोश्त रहे थे भून ।

मायावी हैं, बड़े घाघ हैं, उन्हें न समझो मन्द ।
तक्षक ने सिखलाए उनको ‘सर्प नृत्य’ के छन्द ।
अजी, समझ लो उनका अपना नेता था जयचन्द ।
हिटलर के तम्बू में अब वे लगा रहे पैबन्द ।
मायावी हैं, बड़े घाघ हैं, उन्हें न समझो मन्द ।
(नागार्जुन)
नोट: यह आदमखोर यहाँ भी हो सकता है! हिटलर को हटाकर आरएसएस या मोदी लगाकर पढ़ें!

Tuesday, 1 November 2016

खैनी का गुणगान

खैनी खाओ, जहाँ मुड बने थूके जाओ,
क्या फर्क पड़ता है, किसी का मुंह हो या थोबड़ा;
खैनी खाए जाओ, दूसरों की परवाह क्यूँ,
मजे लो, सस्ता भी है, नशा भी है,
पैसा ना हो तो मान्ग लो, मिल ही जायेगा,
दो 70 चुटकी, 80 ताल, फिर देख लो खैनी का चाल!

कैंसर जबड़े का?
तब देखा जायेगा,
समाज ने दिया यह नशा 10 की उम्र में,
दोस्तों से, कारखाना में, गलियों में,
ऑफिस में, जेल में!
दिमाग सुन्न है, कारन विलुप्त है,
बस वर्तमान नजर आता है,
जो बर्बाद हो चूका है!

भगवन पर भरोसा करो, खैनी खाओ,
मदिरा और सुट्टा भी लगाओ,
गन्दगी और बेचारगी फैलाओ,
देश भक्ति का नारा लगाओ,
जय हिन्द, जय भारत,
जय जवान जय किसान!

जय हो खैनी!
सुबह हो या शाम,
शौच से पहले, शौच के बाद,
नाश्ता से पहले, खाना के बाद,
गप करते समय, चुप रहते समय,
सिनेमा घरों में, बस और ट्रेन में!
उंगल का इस्तेमाल करो,
घुसेड़ो मुंह में या निकालों मुंह से,
खिड़की से बाहर, बिस्तर के बगल में!
खैनी खाओ, बनानेवाले को मालामाल बनाओ,
खुद बीमार, जाहिल रहो!
सामाजिक विघटन में सहयोग दो!
खैनी जिंदाबाद, पर तुम भी क्या जिंदाबाद हो?
वैसे भी फर्क नहीं पड़ता इसका समाज पे!

खैनी के कई रूप!
गुटका से गुड़ाकू तक,
बीडी से सिगरेट तक,
असर है जबड़े से फेफड़े तक,
कैंसर की गिरफ्त तक!

हाय रे मानवता,
दुसरे के मुनाफे के लिए,
खुद को लुटा रहे हो!
खैनी जिंदाबाद,
बेबस इन्सान मुर्दाबाद,
दोनों नहीं हो सकते जिंदाबाद,

इसलिए खैनी जिंदाबाद!

कृष्ण कान्त 

Sunday, 23 October 2016

रात पसरी

रात पसरी है मगर तारे जगे बैठे हैं
देख तो, सुबह के हरकारे जगे बैठे हैं ।
हाँ,आतंक का सन्नाटा नगर पर काबिज़
पर दीवारों पे सुर्ख़ नारे जगे बैठे हैं ।
इधर अलावों में कुछ आग बचाने वाले
रौशनी के कई रखवारे जगे बैठे हैं ।
वक़्त आसां नहीं जो चैन से सो लेगा ' कमल'
तेरी चौखट पे भी हत्यारे जगे बैठे हैं ।
----- आदित्य कमल

Friday, 7 October 2016

चिराग था...फितरत से, जलता रहा.

क्रांतिकारी व्यक्तित्वों को समर्पित
जिस राह पर ....हर बार मुझे,
अपना कोई.....छलता रहा !
फिर भी ....न जाने क्यों मै,
उस राह ही....चलता रहा !
सोचा बहुत....इस बार,
रोशनी नहीं....धुआं दूंगा...
लेकिन चिराग था...फितरत से,
जलता रहा...जलता रहा !!!

Friday, 30 September 2016

वह सुबह कभी तो आयेगी : साहिर

इन काली सदियों के सर से जब रात का आंचल ढलकेगा
जब दुख के बादल पिघलेंगे जब सुख का सागर झलकेगा
जब अम्बर झूम के नाचेगा जब धरती नगमे गाएगी
वो सुबह कभी तो आएगी

जिस सुबह की ख़ातिर जुग जुग से हम सब मर मर के जीते हैं
जिस सुबह के अमृत की धुन में हम ज़हर के प्याले पीते हैं
इन भूखी प्यासी रूहों पर इक दिन तो करम फ़रमाएगी
वो सुबह कभी तो आएगी

माना कि अभी तेरे मेरे अरमानों की क़ीमत कुछ भी नहीं
मिट्टी का भी है कुछ मोल मगर इन्सानों की क़ीमत कुछ भी नहीं
इन्सानों की इज्जत जब झूठे सिक्कों में न तोली जाएगी
वो सुबह कभी तो आएगी

दौलत के लिए जब औरत की इस्मत को ना बेचा जाएगा
चाहत को ना कुचला जाएगा, इज्जत को न बेचा जाएगा
अपनी काली करतूतों पर जब ये दुनिया शर्माएगी
वो सुबह कभी तो आएगी

बीतेंगे कभी तो दिन आख़िर ये भूख के और बेकारी के
टूटेंगे कभी तो बुत आख़िर दौलत की इजारादारी के
जब एक अनोखी दुनिया की बुनियाद उठाई जाएगी
वो सुबह कभी तो आएगी

मजबूर बुढ़ापा जब सूनी राहों की धूल न फांकेगा
मासूम लड़कपन जब गंदी गलियों में भीख न मांगेगा
हक़ मांगने वालों को जिस दिन सूली न दिखाई जाएगी
वो सुबह कभी तो आएगी

फाक़ों की चिताओ पर जिस दिन इन्सां न जलाए जाएंगे
सीने के दहकते दोज़ख में अरमां न जलाए जाएंगे
ये नरक से भी गंदी दुनिया, जब स्वर्ग बनाई जाएगी
वो सुबह कभी तो आएगी

जब धरती करवट बदलेगी, जब कैद से कैदी छूटेंगे
जब पाप घरौंदे फूटेंगे, जब जुल्म के बंधन टूटेंगे
उस सुबह को हम ही लायेंगे, वो सुबह हमीं से आयेगी!
वो सुबह हमीं से आयेगी!

मनहूस समाजी ढाँचों में जब ज़ुल्म न पाले जायेंगे
जब हाथ न काटे जायेंगे जब सर न उछाले जायेंगे
जेलों के बिना जब दुनिया की सरकार चलाई जायेगी
वो सुबह हमीं से आयेगी!

संसार के सारे मेहनतकश खेतों से मिलों से निकलेंगे
बेघर, बेदर, बेबस इंसान तारीक बिलों से निकलेंगे
दुनिया अमन, खुशहाली के फूलॉ से सजाई जायेगी
वो सुबह हमीं से आयेगी!

-साहिर

Wednesday, 21 September 2016

किसकी आज़ादी है??

साठ फ़ीसदी(#) आबादी के हिस्से, जब बरबादी है
आप ही कहिए कि यह कैसी और किसकी आज़ादी है !
सुख की बदरी घनी-घनी सी किनकी छत पर बरसी है
मेरी तरफ़ सैलाब दुःखों का या फिर बूंदा-बांदी है ।
मांग-पत्र और धरने का यह हश्र आजकल है भाई
तम्बू- पोस्टर चिन्दी-चिन्दी, जेल में हर फ़रियादी है ।
अपना तो छानी-छप्पर और घर-दुआर सब कबड़ गया
दुनियाभर में ढोल पिटा कि यह विकास की आंधी है ।
मज़दूरी और वेतन का जो हाल बेहाल है, मत पूछो
नोट हजरिया पर भी देखो नाक सुड़कता 'गांधी' है ।
घोर ज़हालत, ज़ुल्मो -ज़िल्लत और जहन्नुम में जीना
जीवन है या सिस्टम सारा सैयादी- जल्लादी है ।
शासन-भाषण, अमला- जमला एक ताल पर नाच रहे
ताल 'कहर' वा,ठसक थाट;सब राग ही पूंजीवादी है ।
------आदित्य कमल
(90% आबादी) 

Monday, 19 September 2016

ग्वाटेमाला की जनता के संघर्षों की कवितायेँ

ग्वाटेमाला की जनता के संघर्षों के सहयोद्धा और जीवन के चितेरे कवि 'ओतो रेने कास्तिय्यो' की कविताएँ...

🔴इन चन्द-एक महीनों में

यह ठूँठा पेड़
बसन्त में
चिडि़यों से भर जायेगा
और यह
धुँआ बादलों
के बीच अपनी जवानी खो देगा
सर्दियों से जकड़ी और भागती हुई सड़कें
गर्मियों में बेहद आराम से चलेंगी
और पहले से कहीं अधिक भरी होंगी
मेरे नहीं होने पर।
शायद अप्रैल में इन बड़े कुत्तों से डरता यह बच्चा
नवम्बर में उन्हें पुचकार रहा होगा
और यह बूढ़ा आदमी जो अभी हमारी ओर देख रहा है शायद किसी बेहद दूर के तारे से तब तुम्हे देखे
या किसी ताज़े खिले फूल से
जिसकी अभी कल्पना भी नहीं की जा सकती
कि वे ऐसी बूढ़ी आँखों से खिल सकते हैं।

लेकिन मेरी जान, कोई भी
कोई भी तुम्हें अपने जलते हुए ह्रदय से नहीं देखेगा
मानों किसी दु:ख झेलते, दूर के घायल तारे की तरह।
भोर के बिना, फूल के बिना, गौरयों के बिना।
हवा की धड़कनों से दूर
तुम्हारे बालों को सँवारता
जब आमना सामना होगा
तुम्हारी शिनाख्त से मेरी नामौजूदगी का।
तब नदी का पानी
शायद
कई पुलों को
पार कर चुका होगा।
और तुम्हारी प्यार भरी छुअन में
नामौजूद होगा मेरा सीना।
और हवा में रहेगी मेरे स्पर्श की कोमलता।

🔴आज़ादी

तुम्हारे लिए
हमनें चमड़ी में कई आघात
जमा किये हैं
कि खड़े-खड़े भी
हम मौत की
नाप में नहीं समायेंगे।

मेरे देश में,
आज़ादी मात्र आत्मा से निकली
नाज़ुक साँस नहीं है,
बल्कि यह
चमड़ी का साहस भी है।
इसके अथाह विस्तार के
हर एक मि‍लीमीटर में
तुम्हारा नाम लिखा है:
आज़ादी।
उन यंत्रणा झेले
हाँथों पर,
शोक से अचम्भित उन खुली आँखों में।
गर्व से झिलमिलाते
ललाट पर।
उस सीने में जहाँ
जीवट व्यक्ति हमारे अन्दर
महान बनता है।
खुद पर गर्व करने वाले
उन अण्डकोषों में।
वहाँ तुम्हारा नाम है,
तुम्हारी कोमलता और तुम्हारे नाम की नर्मी
उम्मीद और साहस के गीतों में गाया जाता है।

हम कई जगह झेल चुके हैं
उन यंत्रणा देने वालों की यातनाएँ
और हमारी छोटी चमड़ी पर
तुम्हारा नाम इतनी बार लिखा है,
कि अब हम मर नहीं सकते
क्योंकि आज़ादी मरती नहीं।
मगर वे हमारी यंत्रणा
बेशक लगातार जारी रख सकते हैं।
लेकिन आज़ादी, तुम हमेशा
विजयी रहोगी।
और जब हम अपनी बन्दूकों से
आख़िरी गोली दाग रहे होंगे
तो आज़ादी तुम पहली होगी
जो मेरे साथियों के कण्ठ
से गा रही होगी।
क्योंकि इस धरती के अथाह विस्तांर में
कोई भी चीज़
इतनी खूबसूरत नहीं है
जितने किसी समाप्त होती
व्यवस्था पर
आज़ाद जनता के गौरवपूर्ण
पैर।

🔴‘दी ग्रेट नॉन कनफॉरमिस्ट’

किसी भी इंसान से
यह मत पूछो
कि क्या
वह दु:खी है,
क्योंकि
इस या उस रूप में
किसी न किसी राह पर
सभी दु:ख झेल रहे हैं।

आज,
मिसाल के लिए,
मेरी मिट्टी
मैं अपनी आत्मा की गहराई तक
तुम्हारे दु:ख से दुखी हूँ।

और
तुम्हारी त्रासदी से आहत
मैं इससे
भाग नहीं सकता।

मैं तुम्हें जीऊँगा
क्योंकि तुम्हे
ज़िन्दगी की पीठ
दिखाने के लिए
मेरा जन्म नहीं हुआ है
बल्कि मेरे पास
जो श्रेष्ठ और सबसे सार्थक है:
वह है मेरी ज़िन्दगी,
उसकी गरिमा और उसकी कोमलता।

2.
यदि तुम्हारे साथ कोई दु:खी है
तो वह दीन आदमी मैं हूँ
मैं वह हूँ
जो तम्हारे भिखारियों, तुम्हारी वेश्याओं,
तुम्हारी भूख,
तुम्हारी टूटी-फूटी बस्तियों
के दुख झेल रहा है
जहाँ भूख और ठण्ड के
गिद्ध मण्डराते हैं।

लेकिन मैं सिर्फ़ अपनी
खुली आँखों से तकलीफ़ नहीं झेलता
बल्कि शरीर और आत्मा के
आघातों के साथ दु:खी हूँ
क्योंकि कुछ और होने से पहले मैं
एक विद्रोही हूँ
जो अपने समय की प्रतीक्षा
कर रहे लोगों की चमड़ी के नीचे
रहता है
ये वही आम लोग हैं
जिनके अलावा
कोई नहीं जानता कि
संघर्ष कभी त्यागा नहीं जाता
और न ही त्यागी जाती है जीत।

🔴अपराजेय

मेरी प्यारी, हम सभी अपराजेय हैं।
इतिहास और लोगों से हम बने हैं।
जनता और इतिहास भविष्य को चलाते हैं।

और कुछ नहीं जीवन से अधिक अपराजेय;
इसके झोंके हमारी पाल में हवा भरते हैं।

जब हम हासिल करेंगे जीत तो
हमारे साथ विजयी होगी जनता, इतिहास और ज़िन्दगी।

हमारे हाथों के अन्तिम छोर पर अभी ही भोर होने लगी है और हमारे अन्दर सुबह अपनी आँखें खोल रही है,
क्योंकि हम उसका घर बनाते हैं, उसकी किरणों के संरक्षक हैं।

हमारे साथ आओ कि लड़ाई अभी जारी है।
औरतों! अपने मिलिशिया गर्व को जगाओ।
हम सभी जीतेंगे मेरी प्यारी साथियो!

परिचय -
ओतो रेने कास्तिय्यो, जन्म: 1936, ग्वाटेमाला के क्रान्तिकारी, गोरिल्ला योद्धा और कवि थे। 1954 में ‘सीआईए’ द्वारा प्रायोजित जनवादी ‘आरबेन्ज़  सरकार’ के तख्तापलट के बाद कास्तिय्यो निर्वासन में एल सल्वादोर चले गये। यहाँ उनकी मुलाकात कवि रोके दाल्तन और दूसरे लेखकों से हुई जिन्होनें उनकी शुरुआती कविताओं के प्रकाशन में मदद की। 1957 में आर्मास तानाशाह के मरने के बाद वे ग्वाटेमाला वापस आये और 1959 में पढ़ाई के लिए जर्मन डेमोक्रेटिक रिपब्लिक गये जहाँ से उन्होंने स्नातकोत्तर की डिग्री हासिल की। 1964 में वे ग्वाटेमाला वापस आये और ‘वर्कर्स पार्टी’ में सक्रीय हो गये और साथ ही ‘कैपिटल सिटी म्युनिसिपैलिटी’ में ‘एक्स्पे रिमेण्टल थियेटर’ की स्थापना की। इसी दौरान इन्होंने कई कविताएँ लिखी और उन्हें प्रकाशित कराया। उसी साल कस्तिय्यो को गिरफ़्तार कर लिया गया लेकिन किसी तरह वह भाग निकलने में क़ामयाब रहे और इस बार वे यूरोप चल निकले। साल के अन्तर तक वह गुप्त रूप से ग्वाटेमाला वापस आ गये और जाकापा पर्वतों में चल रहे गोरिल्ला आन्दोलन में सक्रीय हो गये। वर्ष 1967, ग्वाटेमाला के लिए दुर्भाग्यपूर्ण रहा, उसने एक योद्धा, एक कवि, एक ज़िन्दादिल नौजवान खो दिया। 1967 का अन्त होते-होते कई क्रान्तिकारियों के साथ कास्तिय्यो भी पकड़े गये; अन्य, कॉमरेड और किसानों के साथ उन्हें भयंकर यंत्रणा दी गयी और आख़िर में उन सभी को ज़िन्दा जला दिया गया। इस प्रकार एक योद्धा कवि अपनी मिट्टी, अपने लोगों के लिए अन्तिम साँस तक लड़ता रहा। एक बेहतर, आरामदेह ज़िन्दगी जीने के तमाम अवसर मौजूद होने के बावजूद उसने जनता का साथ चुना और आख़िरी दम तक उनके साथ ज़िन्दगी को खूबसूरत बनाने के लिए लड़ता हुआ शहीद हो गया

▪कविताओं का मूल स्पानी (स्पेनिश) से अनुवाद और परिचय प्रस्तुति -लता

Saturday, 17 September 2016

भगतसिंह की कविता

मुक्ति
...
अरे मनुष्यो! करते हो गर्वोक्ति
कि तुम सन्तति हो मुक्त और वीर पितरों की,
पर यदि लेता साँस एक भी दास धरा पर,
तो क्या सचमुच तुम हो मुक्त और वीर?
यदि तुमको अहसास नहीं जब
बेड़ी पीड़ा देती एक भाई को,
तो क्या सचमुच तुम नहीं अधम दास
जो क़ाबिल नहीं मुक्त होने के?
क्या है वह सच्ची मुक्ति, जो तोड़े
ज़ंजीरें बस अपनी ख़ातिर,
और भुला दे संगदिल होकर
कि मानवता का क़र्ज़ है हम पर?
नहीं, सच्ची मुक्ति तभी जब हम बाँटें
सब ज़ंजीरें, जो पहने हैं अपने भाई,
और भाव औ’ कर्म से लगकर
हाँ औरों की मुक्ति में तत्पर!
दास तो वे जो भय खाते हैं स्वर देने में
गिरे हुए और दुर्बल की ख़ातिर;
दास तो वे जो नहीं चुनेंगे
घृणा, डाँट और गाली
और दुबककर मुँह मोड़ेंगे
सच से, इस पर सोच ज़रूरी;
दास तो वे जो हिम्मत न करें
दो या तीन भी हों गर सच के हक़ में।
- “जेम्स रसेल लॉवेल” (पृष्ठ 189)
भगतसिंह की पूरी जेल नोटबुक 28 सितम्‍बर को नौजवान भारत सभा की वेबसाइट पर यूनिकोड फॉर्मेट में उपलब्‍ध होगी। हमारी वेबसाइट www.naubhas.in पर आप उस दिन विजिट करें।

Tuesday, 7 June 2016

मुनाफे के लिए मर रहा हूँ मै!

छटपटा रहा हूँ जिन्दा रहने के लिए,
जानवर नहीं, इंसान हूँ!
दो रोटी और एक छत के लिए,
शिक्षित हूँ, हुनर भी रखता हूँ,
पर काम नहीं है, सड़ता जा रहा हूँ!
सुना है, ज्यादा उत्पादन हो गया है,
जो सड रहे हैं, खलिहानों और भंडारों में,
जब बिकेंगे मुनाफे में तो मुझे भी कोई पूछेगा,
उम्मीद है जो टूट रहा है,
मुनाफा दर के घटते जाने से,
काम मिल जाता तो, मै भी मदद करता,
तुम्हारे 'बेशी मूल्य' और 'मुनाफा' बढ़ने में!
कम से कम जिन्दा तो रहता,
भले ही चलते फिरते लाश के रूप में!
लेकिन यह आर्थिक व्यवस्था होने नहीं देगी,
बेरोजगारी ख़त्म, मुनाफा जो घाट जायेया!

Tuesday, 31 May 2016

नेता और सुअर

संजीबा की कविता........." नेता और सुअर "
-----------------------------------------------------------------
मुझे इन नेताओं से अच्छे
सुअर के बच्चे लगे,
जो कम से कम रोजाना
मेरी गली तो घूम जाते हैं,
और अपने स्तर से
गंदगी खाकर
साफ तो कर जाते हैं,
लेकिन
वो कम्बख़्त आएगा
सिर्फ चुनाव के वक़्त
बस - वोट माँगने
और ये सफाई देने
कि - मैं सुअर से अच्छा हूँ
और कुछ नहीं....................
मेरी टिपण्णी: हम खुद सत्ता अपने हाथ में क्यूँ न ले लें?

Sunday, 29 May 2016

सर्वहारा क्रांति: जिंदाबाद!

क्रांति नहीं आसां
तो क्रांति विरोधी हो जाएँ?
मुक्ति नहीं आसां
तो गुलामी को गले लगा लें?
मालिक का विरोध नहीं कर सकते
तो घर में पत्नी की पिटाई कर दें?
हालात इतने बुरे नहीं दोस्तों,
बाहर तो निकले,
सैकड़ों साथी मिलेंगे!
विरोध का झंडा तो ऊपर करें,
हजारों साथ निकल पड़ेंगे!
पूंजी के खिलाफ एक कदम आगे बढ़ाएं,
लाखों हाथ साथ मिलेंगे!
क्रांति के लिए आगे बढ़ें,
करोडो सर्वहारा आपको आगोश में लेंगे!

सर्वहारा क्रांति जिंदाबाद!

क्रांति

क्रांति की गूंज लोक सभा, विधान सभा में नहीं,
गलियों में सुनाई देती है!
न्यायलय में नहीं, जहाँ मरते प्रजातंत्र की सिसकियाँ ही सुनाई देती हैं,
वहां जहाँ जिंदादिल मजदुर खटते हैं रात दिन, किसी के मुनाफे के लिए!
पुलिस चौकी में नहीं, जहाँ किसानो से लिखवाया जाता है पट्टा,
टाटा, अम्बानी को जमीं दिलवाने के लिए, मुनाफे के लिए,
खेतों, खलिहानों में जहाँ वह मरते हैं जिन्दा रहने के लिए,
और बैंकों और साहूकारों के कर्ज चुकाने के लिए!
7 सितारा होटल में नहीं, जहाँ विश्व भर के पूंजीपति मिलते हैं, मुनाफे में बटवारे के लिए,
बल्कि जेल में जहाँ, क्रन्तिकारी बंद हैं वर्षों से, बिना मामला खुले हुए!
क्रांति वहां नहीं पनपती है, जहाँ दिन रात षडयंत्र होता है,
धर्म, जाति, पूंजी के ठेकेदारों द्वारा,
बल्कि वहां जहाँ दिल में बसते है भगत सिंह,
जहाँ अन्याय और शोषण के खिलाफ पैदा होते हैं नए क्रांति वीर!
मजदुर एकता जिंदाबाद! क्रन्ति जिंदाबाद!

खौफ

भूख खौफ का नाश्ता करती है,
सन्नाटे का खौफ गलियों में गूंजता है,
खौफ धमकाती है-----
अगर तुमने प्यार किया, तो तुम्हे एड्स हो जाएगा
अगर तुमने सिगरेट पी, तो तुम्हे कैंसर हो जाएगा
अगर तुमने सांस ली, तो तुम प्रदूषण के शिकार होगे
अगर तुमने शराब पी, तो तुम हादसे का शिकार होगा
अगर तुमने खाया, तो तुम्हारा कोलेस्ट्राल बढ़ेगा,
अगर तुम बोलोगे, तो तुम नौकरी से निकाल दिए जाओगे
अगर तुम चलोगे, तो तुम लूट लिए जाओगे
अगर तुम सोचोगे, तो तुम्हे फिक्र होने लगेगी
अगर तुम शक करोगे, तो तुम पागल हो जाओगे
अगर तुम महसूस करोगे, तो तुम अकेले पड़ जाओगे
--खौफ की खिड़की!
 एदुआर्दो गालेआनो

Sunday, 8 May 2016

क्रांतिकारी मां!

जिन्होंने चुराये हमारे बच्चे
हमारी जमीन, हमारे जंगल
इस ग्रह का आनंदमय वर्तमान और भविष्य
और जो अपने अपने
राष्ट्र की संकुचित घेरेबंदी में
मां की बात करते हैं
जय मातृभूमि का थोथा शोर करते हैं
वे न हम छापामार मांओं को जानते हैं
न ही गोर्की की मां को
उनके इतिहास में नहीं है झलकारी बाई
नहीं हैं सिनगी दइ और कइली दइ
फूलो-झानो, माकी मुंडा और देवमनी भगत भी नहीं हैं
वे तो लक्ष्मी बाई को भी मरदाना कहते हैं
उसे स्त्री नहीं मानते
वे कौन हैं जो मांओं का बाजार सजाते हैं
भूला देना चाहते हैं रानी गाइदिनल्यू को
वे कौन हैं जो कोंख को त्रिशुलों पर उछालते हैं
और हजारों उन्मादी कंठों से चीखते हैं
यत्र नार्यस्तु पूजयंते रमंते तत्र देवता
जो नहीं जानते हैं मांओं को
वही बनाते हैं मां को ग्लोबल उत्पाद
वे भूल जाते हैं
कि मां का दूध सिर्फ दूध नहीं होता
रक्त होता है
जो उसकी छापामार देह से शुरू होकर
दौड़ता रहता है लड़ाकों की देह के अनंत विस्तार तक
जो बनाये रखता है
हर एक आत्मा को सजीव और सक्रिय!

Monday, 2 May 2016

ग़ज़ब की आफ़त आई है

न पानी है , न बिजली है ; न रोटी , ना दवाई है
कहर सी आफ़त है भाई , गज़ब की आफ़त आई है।
भरे गोदाम हैं सारे
मरें हम भूख के मारे
इधर पसरा हुआ सूखा
उधर चलते हैं फव्वारे
यहाँ के अस्सी फीसद आदमी के घर उदासी है
हमारे चेहरों पे फैली हुई बस बदहवासी है
महज कुछ फीसदी के चेहरे पे रौनक , ललाई है ।
न पानी है , न बिजली है .....
समूचे मुल्क का अब हाल
बेतरतीब दिखता है
ये कैसा रहनुमा है
मौत का कॉन्ट्रैक्ट लिखता है
करोड़ों और अरबों ऊपर-ऊपर ग़ुम हो जाता है
हमारी लाशों के मलबों का उनसे गहरा नाता है
खुली है लूट या फिर हाथ की शातिर सफाई है ।
न पानी है , न बिजली है.....
तरक्की ऐसी कि अब हर इलाका
उजड़ा - उजड़ा है
इधर से मानो छुट्टा साँढ़
सबकुछ चरते गुजरा है
पनामा है , हवाई है , दीवाला है , हवाला है
सब इनके बाप का है , कौन क्या अब कहनेवाला है
जहां था कांग्रेसी , आज बैठा भाजपाई है ।
न पानी है , न बिजली है.....
अगर बीमार पड़ जाओ
तो बस भगवान को गाओ
इलाज होने के पहले
बर्तन-बासन बेच कर आओ
हमारा आज संकट में है और भवितव्य अँधा है
यहाँ तो फूलता - फलता महज दौलत का धंधा है
कि सब लुट जाता है ,बचती सिरिफ सिसकी,रुलाई है ।
न पानी है , न बिजली है .....
यहाँ परदे में इज़्ज़त
लूट ली जाती है घर घुस के
यहाँ बेटी - बहन से
कहा जाता है चलो झुक के
हमारे मुल्क की ताज़ा हवाएँ सूलियों पर हैं
यहाँ पंचायतों से दिए जाते फतवे बर्बर हैं
यहाँ हर बात पर रस्मों - रिवाज़ों की दुहाई है
न पानी है , न बिजली है .....
यहाँ दंगों से अब तो
हर सियासी खेल सजता है
गज़ब है ढोंग , हत्यारा ही
जनता-नाम भजता है
हरेक तक़रीर में नफ़रत भरी है ख़ूनी स्याही से
डरा - सहमा हुआ है आज भाई अपने भाई से
अरे , शासन है या कि कोई जालिम आतताई है ।
न पानी है , न बिजली है .....
यहां सबकुछ है , पूरा है
मगर है यार कब्ज़े में
जमीं उनकी , हरेक औजार
सब हथियार कब्ज़े में
उन्हीं का माल , सब असबाब , हर बाज़ार कब्ज़े में
इधर हम कसमसाते , चीखते बेजार कब्ज़े में
उठो , कब्ज़ा करें अब हम ; ये कब्ज़े की लड़ाई है
न पानी है , न बिजली है , न रोटी ,ना दवाई है
कहर सी आफ़त है भाई , गज़ब की आफ़त आई है।
----- आदित्य कमल

Tuesday, 26 April 2016

मेरे क्रोध की लपटें - एक फ़िलिस्तीनी स्त्री!

मेरे क्रोध की लपटें - एक फ़िलिस्तीनी स्त्री (अनुवाद : वीणा शिवपुरी)
तुमने मुझे बाँधा है
जकड़ा है ज़ंजीरों में
पर लपटें मेरे क्रोध की
धधकती हैं, लपकती हैं।
नहीं कोई आग इतनी तीखी
क्योंकि मेरी पीड़ा के ईंधन से
ये जीती हैं, पनपती हैं।
आग को ठण्डाने के लिए
हँस सकती हूँ मैं भी
उन लोगों की ताक़त पर
हैं नहीं जो इंसान
कहलाने के काबिल भी।
शरीर बाँध सकते हो,
बेड़ियों से, जंज़ीरों से
शब्दों को बन्दी बनाना नहीं मुमकिन
वो तो उड़ जायेंगे
मुक्त पंछियों से!!

Thursday, 21 April 2016

ओ मजूरा उठ मजूरा बढ़ मजूरा चल मजूरा

ओ मजूरा उठ मजूरा बढ़ मजूरा चल मजूरा
समर-संघर्ष कर मजूरा,क्रांति बिगुल बजा मजूरा।
अब रुको रुको नहीं अब झुको झुको नहीं
एक क्षण की देरी भी युगो का फासला बनेगा
हाँ तू शस्त्र उठा मजूरा क्रांति बिगुल बजा मजूरा।
प्रजातंत्र- लुटेरा का नापाक इरादा ध्वस्त कर
पूंजीवादी सत्ता के मनसूबे को चूर चूर चूर कर
हर चाटुकारों को कुचल क्रांति बिगुल बजा मजूरा।
देखो ठग दाढ़ी बढ़ा धर्मांध है फिराक में
नफरत की जहर-आग को फैला रहा समाज मे
जहरीला धर्मांध कुचल क्रांति बिगुल बजा मजूरा।

Vinay Krishna KaleBadal मजूरा से

Sunday, 17 April 2016

दुनिया भर में डर

एदुआर्दो गालेआनो की कविता — दुनिया भर में डर
जो लोग काम पर लगे हैं वे भयभीत हैं
कि उनकी नौकरी छूट जायेगी
जो काम पर नहीं लगे वे भयभीत हैं
कि उनको कभी काम नहीं मिलेगा
जिन्हें चिंता नहीं है भूख की
वे भयभीत हैं खाने को लेकर
लोकतंत्र भयभीत है याद दिलाये जाने से और
भाषा भयभीत है बोले जाने को लेकर
आम नागरिक डरते हैं सेना से,
सेना डरती है हथियारों की कमी से
हथियार डरते हैं कि युद्धों की कमी है
यह भय का समय है
स्त्रियाँ डरती हैं हिंसक पुरुषों से और पुरुष
डरते हैं निर्भय स्त्रियों से
चोरों का डर, पुलिस का डर
डर बिना ताले के दरवाज़ों का,
घड़ियों के बिना समय का
बिना टेलीविज़न बच्चों का, डर
नींद की गोली के बिना रात का और दिन
जगने वाली गोली के बिना
भीड़ का भय, एकांत का भय
भय कि क्या था पहले और क्या हो सकता है
मरने का भय, जीने का भय

राजे ने अपनी रखवाली की: सूर्यकान्त त्रिपाठी ‘निराला’

राजे ने अपनी रखवाली की;
किला बनाकर रहा;
बड़ी-बड़ी फ़ौजें रखीं ।
चापलूस कितने सामन्त आए ।
मतलब की लकड़ी पकड़े हुए ।
कितने ब्राह्मण आए
पोथियों में जनता को बाँधे हुए ।
कवियों ने उसकी बहादुरी के गीत गाए,
लेखकों ने लेख लिखे,
ऐतिहासिकों ने इतिहास के पन्ने भरे,
नाट्य-कलाकारों ने कितने नाटक रचे
रंगमंच पर खेले ।
जनता पर जादू चला राजे के समाज का ।
लोक-नारियों के लिए रानियाँ आदर्श हुईं ।
धर्म का बढ़ावा रहा धोखे से भरा हुआ ।
लोहा बजा धर्म पर, सभ्यता के नाम पर ।
ख़ून की नदी बही ।
आँख-कान मूंदकर जनता ने डुबकियाँ लीं ।
आँख खुली– राजे ने अपनी रखवाली की ।

Tuesday, 5 April 2016

हिटलर के तम्बू में

हिटलर के तम्बू में
नागार्जुन
आदमखोर ये यहां भी हो सकता है!
आदमखोर
ये यहां भी हो सकता है!
अब तक छिपे हुए थे उनके दाँत और नाख़ून ।
संस्कृति की भट्ठी में कच्चा गोश्त रहे थे भून ।
छाँट रहे थे अब तक बस वे बड़े-बड़े क़ानून ।
नहीं किसी को दिखता था दूधिया वस्‍त्र पर ख़ून ।
अब तक छिपे हुए थे उनके दाँत और नाख़ून ।
संस्कृति की भट्ठी में कच्चा गोश्त रहे थे भून ।
 
मायावी हैं, बड़े घाघ हैं, उन्हें न समझो मन्द ।
तक्षक ने सिखलाए उनको ‘सर्प नृत्य’ के छन्द ।
अजी, समझ लो उनका अपना नेता था जयचन्द ।
हिटलर के तम्बू में अब वे लगा रहे पैबन्द ।
मायावी हैं, बड़े घाघ हैं, उन्हें न समझो मन्द ।
Fir se lotenge bhediye
पहले वे आये कम्युनिस्टों के लिए
और मैं कुछ नहीं बोला
क्योंकि मैं कम्युनिस्ट नहीं था।
फिर वे आये ट्रेड यूनियन वालों के लिए
और मैं कुछ नहीं बोला
क्योंकि मैं ट्रेड यूनियन में नहीं था।
फिर वे आये यहूदियों के लिए
और मैं कुछ नहीं बोला
क्योंकि मैं यहूदी नहीं था।
फिर वे मेरे लिए आये
और तब तक कोई नहीं बचा था
जो मेरे लिए बोलता।
पास्टर निमोलर
(हिटलर के शासनकाल के एक कवि और फासीवाद विरोधी कार्यकर्ता)