Friday, 23 December 2016

पूंजीवाद : एक डायन!!!

धरती के चप्पे-चप्पे को बाज़ार बनाती है
हर संबंधों को सिक्कों का व्यापार बनाती है
बस्ती-बस्ती में ज़हरीली दीवार बनाती है
आबादी का जीना-मरना दुश्वार बनाती है
यह कैसी डायन बैठी है दुनिया की छाती पर
जो पाठ शांति का करते हुए हथियार बनाती है
--------आदित्य कमल

Tuesday, 20 December 2016

मेरा नाम, जाति और धर्म

मेरे नाम, जाति और धर्म को लेकर कुछ लोगो को जिज्ञासा रहती है.
बता देता हूँ, मेरा धर्म और जाति वही है ,
जिससे तुम नफरत करते हो ।
जब तुम भंगी से नफरत करते हो,
तो मुझे लगता है मै भंगी हूँ,
जब तुम चमार नफरत करते हो तो ,
मुझे लगता है मै चमार हूँ, 
जब तुम जाट से नफरत करते हो तो,
मुझे लगता है मैं जाट हूं ,
जब तुम मुस्लिम से नफरत करते हो तो ,
मुझे लगता है मै मुस्लिम हूँ, 
जब तुम हिन्दू से नफरत करते हो तो ,
मुझे लगता है मैं हिन्दू हूं, ।
जब तुम सरदारों से नफरत करते हो तो ,
मुझे लगता है मैं सरदार हूं ।
जब तुम ईसाई से नफरत करते हो तो,
मुझे लगता है मैं ईसाई हूँ.. 
जब तुम किसान से नफरत करते हो तो,
मुझे लगता है मैं किसान हूं ।
तुम आरक्षण से नफरत करते हो तो ,
मै आरक्षित हूँ, तुम अशिक्षितों से नफरत करते हो तो मै अशिक्षित हूँ ....
मै हर वो इंसान हूँ जिससे तुमको नफरत है, जिसे तुम मिटाना चाहते हो या जिसको डराकर या दबाकर उसका शोषण करना चाहते हो।
मै इंसान हूँ, उसी से तो तुमको सबसे ज्यादा नफरत है ना।

Thursday, 15 December 2016

समाजवाद खुद चलकर आपके पास आ जायेगा: इस धोखे में मत रहना!

आहों से पत्थर पिंघलेगा ,
इस धोखे मे मत. रहना !
तुम्हें कहीं इन्साफ मिलेगा
इस धोखे मै मत रहना !!
भारत जर्रे जर्रे मै ,
सबका अपना हिस्सा है !
बुला कर कोई देगा,
इस धोखे मै मत रहना !!
कहा किसी ने तेरे भाग्य में ,
धन दौलत. की रेखा है !
छप्पर फाड़ के धन बरसेगा ,,
इस धोखे मै मत रहना !!
भाग्य और भगवान तो प्यारे ,
केवल एक छलावा है !
ईश्वर ही कल्याण करेगा,
इस धोखे में मत रहना !!
अगर अधिकार चाहते हो तो साथ में आ जाओ,
ब्राह्मण (मनुवादी) कभी सुधरेगा,
इस धोखे में मत रहना !!

(फेस बुक पर से! शकुन्तला बौद्ध निडर द्वारा)
"सडा गला पूंजीवाद अपने आप ख़त्म हो जायेगा,
समाजवाद खुद चलकर आपके पास आ जायेगा,
इस धोखे में मत रहना!"

Friday, 9 December 2016

धरा को उठाओ, गगन को झुकाओ

दिए से मिटेगा न मन का अँधेरा,
धरा को उठाओ, गगन को झुकाओ !

बहुत बार आई-गई यह दिवाली
मगर तम जहाँ था वहीं पर खड़ा है,
बहुत बार लौ जल-बुझी पर अभी तक
कफन रात का हर चमन पर पड़ा है,
न फिर सूर्य रूठे, न फिर स्वप्न टूटे
ऊषा को जगाओ, निशा को सुलाओ !
दिए से मिटेगा न मन का अँधेरा
धरा को उठाओ, गगन को झुकाओ ! 
सृजन शांति के वास्ते है जरूरी
कि हर द्वार पर रोशनी गीत गाए
तभी मुक्ति का यज्ञ यह पूर्ण होगा,
कि जब प्यार तलवार से जीत जाए,
घृणा बढ़ रही है, अमा चढ़ रही है,
मनुज को जिलाओ, दनुज को मिटाओ!
दिए से मिटेगा... Read more at: http://hindi.webdunia.com/gopal-das-neeraj/%E0%A4%A7%E0%A4%B0%E0%A4%BE-%E0%A4%95%E0%A5%8B-%E0%A4%89%E0%A4%A0%E0%A4%BE%E0%A4%93-%E0%A4%97%E0%A4%97%E0%A4%A8-%E0%A4%95%E0%A5%8B-%E0%A4%9D%E0%A5%81%E0%A4%95%E0%A4%BE%E0%A4%93-108011700075_1.htm