Thursday, 29 October 2020

गर मिल जाये जिंदगी दुबारा

 गर मिल जाये जिंदगी दुबारा

याद है जहां तक वहीं से जीना चाहता हूं
बड़ी नहीं, छोटी मोटी गलतियाँ सुधार सकूं
बड़ा हो गया खास अनुभवी अब तो हो गया हूं
नयी जिंदगी, नये तरीके, नयेपन से अब जी सकूं।
मारा था छोटे भाई को, मारूं ना दुबारा
टिफिन बाद ही भागा जाता था स्कूल से
अब तो जाऊं ही ना स्कूल में कभी शुरू ही से
पास ही ना फटकूं उस सहपाठी के, जिसने था मारा।
जवानी में चक्कर लगाये थे, बनने को नौकर
भटका सारा जहां, इंटरव्यू दिये, हूये सारे बेकार
शादी की उनका सुंदर मुस्कान और मुखड़ा देख कर
इस बार ना ही शादी करूं ना ही बनुं किसी का चाकर।
भले ही भगत सिंह ना कभी बन पाऊं
पर केवल क्रांति का रास्ता ही मैं अपनाउं
पर सब को पता है, ख्याली पुलाव है यह सब
यहीं से आगे बढ़ानी है, अपनी जिंदगानी अब।

हमारे हत्यारे

 हमारे हत्यारे

हमारे हत्यारे ढूंढ रहे थे हमें
जा पहुंचे उन्हीं के मयखाने में
नशे में धूत्त थे, सुपारी के पैसों में
पता न था पहुंच गये मौत के गोद में।
बांछें खिल गयीं, जब पहचाना हमें
हलाल से पहले, भर ली आगोश में हमें
बोला बहुत लम्बी उमर है, मुबारक दी हमें,
बताया बस अभी अभी तो याद कर रहे थे तुम्हें।
एक जाम भी सरकाया हमारे पीने के लिए
खुद लगाया जाम होठों से, ली घूंट मजे के लिए
और फिर सिखाई मुझे तरजीह, जाम पीने के लिए
बोला, जाम उठा, बोलो "तुम्हारी लम्बी उम्र के लिए"।
पता चला, कातिल भी वही, मुंसिफ भी वही
भाग्य भरोसे छोड़, लगा ली मैंने भी दो चार वहीं
नशा टूटा, नींद टूटी जैसे ही विदेसी मुर्गे ने बांग दिया
क्या फर्क पड़ता है, जिंदगी बची और मुफ्त में देसी पिया।

क्यों करें इज्जत औरतों की

 क्यों करें इज्जत औरतों की

नहीं पूजा करता औरतों के लिए
ना ही लड़ता हूं उनके नाम के लिए
मजदूर हैं गर वो, बराबर हों पुरूषों के
हां लड़ता हूं, शोषण के खिलाफ उनके।
औरत एक इंसान है, मजदूर है
पर न देवी है, न ही कोई शक्ति है
न तो वो दासी है, न ही वो मजबूर है
न ही पुरूषों के लिए सेक्स खिलौना है।
निजी सम्पत्ति ने घर में बंद किया
दासता और सामंती ने रखैल बनाया
पूंजी ने माल बना उसे बाजार में ला दिया
खरीद बिक्री का टैग लगा माल बना दिया।
बाजारू नहीं, इंसान बनने दो
देवी नहीं, पर मुंह छुपाना भी नहीं
औरतों की इज्जत घूंघट से हर्गीज नहीं
बराबरी और काम का अधिकार दो जीने दो।

Sunday, 18 October 2020

ये क्या हो गया?

 ये क्या हो गया?

मूर्खों की चल पड़ी, शिक्षक बन गये हैं
जिंहे रास्ते दिखाते थे, राह दिखा रहे हैं
झाड़ फूंक करने वाले डाक्टर बन गये हैं।
पहले गुंडों से मदद लेते जाते थे
अब गुंडे मालिक, साधू चाकर हैं
सारे रिश्ते उल्टे पुल्टे हो गये हैं।
गणित विज्ञान मजाक बन गया है
धर्म अज्ञानता विज्ञान बन गया है
औरत गोरू, जानवर भगवान बन गया है।
न्यायालय दलाली करता है
दलाल ही अब न्याय करता है
मीडिया घटिया जोकर बन गया है।

कहां आ गये हम?

                                                     कहां आ गये हम?

होमोसेपियंस से मानव तक के सफर में
श्रम आधार था, चार से दो पैर पे खड़े होने में
अफ्रीका से अमरीका, युरोप, एशिया तक आने में
पर सिसक रहा है खुद के बनाए पूंजी के निर्मम पैरों में।
क्या अंत है श्रम के सफर की
2-3 लाख वर्षों के भागम भाग की
अनंत समय की दासता, पूंजी की गुलामी में
या बाकि है श्रम और पूंजी के लड़ाई की कहानी में?
श्रम की लड़ाई, यानी श्रमिक की
पूंजी की लड़ाई, यानी पूंजीपति की
अंतिम लड़ाई बाकी है, कहानी अधुरा है
पूंजी का दफन, श्रम के जीत का जश्न बाकी है।

Sunday, 11 October 2020

हमारे घर में आग लगाया है

                                             हमारे घर में आग लगाया है

हमारे घर में आग लगवाया है
महल वालों के गुंडों ने लगवाया है
लग्गी लगा के दूर से ही जलवाया है
खुद आग से बच जाओगे ऐसा सोचा है?

झोपड़पट्टी को सभ्यता से दूर कर रहे हो
मजदूरों का काम खत्म होते लतिया रहे हो
बेरोजगारों की अनगिनत फौज तो बढ़ा रहे हो
अनजाने ही सही, पर अपनी मौत को बुला रहे हो।

झोपडपट्टियों की कतारें बिछा देंगे
झोपड़ महल के फासले खत्म कर देंगे
हवा का रुख बदल लपटें महलों तक पहूंचा देंगे
हमारा जो भी हो, तुम्हारा भी नामों निशान मिटा देंगे।

बच्चे भगवान के रूप?

                                                बच्चे भगवान के रूप?

बच्चे बच्चे होते हैं
अच्छे अच्छे से होते हैं
कुत्तों के या आदमी के हैं।

स्वस्थ्य हों, पेट भरा हो
तो खेलते और हंसते रहते हैं
प्यारे प्यारे से, लुभावने लगते हैं।

इनकी छोटी सी जरूरत है
भूख और बिमारी से मुक्ती की है
पर पूंजीवाद है, जो इनकी खान है।

भगवान, अल्लाह, गॉड
सारे पूंजीवाद के लिए ही तो हैं
और बिचारे गरीब बच्चों के दुश्मन हैं।

सैनिक

 सैनिक

सैन्य प्रशिक्षण, सैन्य अनुशासन है
सैन्य जीवन एक कठोर कवायद है
कदमताल मरने मारने को तैयार है
क्या सिर्फ देश, समाज के लिए है?

गरीब किसान मजदूर का बच्चा
जीवन को तलाशता हुआ कच्चा
पहुंचा था वो सैनिक भर्ती केंद्र में
निकला रंगरुट वो सैनिक वर्दी में

भटक रहा था रोजी रोटी के लिए
तनख्वाह, जीवन, पेंशन के लिए
कमाने आया था परिवार के लिए
मर गया बिचारा "वतन" के लिए।

लड़ें वह और मुनाफा कमायें दूजे
सैनिक के नाम पर वोट मांगे तीजे
सैनिक स्मारक शिलान्यास करें वो
सैनिक मांगों पर ठेंगा दिखायें वो।

Wednesday, 7 October 2020

सैनिक

 सैनिक

सैन्य प्रशिक्षण, सैन्य अनुशासन है
सैन्य जीवन एक कठोर कवायद है
कदमताल है मरने मारने को तैयार है
पर क्या देश और समाज के लिए है?
गरीब किसान मजदूर का बच्चा
जीवन को तलाशता हुआ कच्चा
पहुंचा गया था सैनिक भर्ती केंद्र में
निकला रंगरुट वो सैनिक वर्दी में
भटक रहा था रोजी रोटी के लिए
तनख्वाह और पेंशन के लिए
जीने आया था परिवार के लिए
मर जाता है बिचारा "वतन" के लिए।
लड़ें वह, मुनाफा कमायें वो
सैनिकों के नाम पर वोट लें वो
सैनिक स्मारक शिलान्यास करें वो
सैनिकों के मांग पे ठेंगा दिखायें वो।

कुंठित मन

 कुंठित मन

70% के साथ स्नातक डिग्री ली थी
चोरी नहीं, मिहनत से पढ़ाई की थी
रट्टा भी मारा था और समझा भी था
आज नहीं, वह कल का जीवन था।
धर्म पर युद्ध है, जातीय संस्कृति है
गॉड को बचाना है, देश पे लड़ना है
इंसान का क्या, खाना तक नहीं है
मुर्त को मारो, मुर्ती पीछे भागना है।
अजीब कश्मकश है, घोर अंधेर है
अज्ञान, व अंधविश्वास का जोर है
विज्ञान पढ़ा किसी काम का नहीं है
जो पढ़ा नहीं कभी सर पे सवार है।
फासीवादी सत्ता, नंगा नाच रहा है
भारी बेगारी कुंठित मन लाचारी है
मजदूर, किसान, युवा बदहवास है
प्रजातंत्र पस्त है फासीवाद मस्त है।

जीवित या मृत, हलचल नहीं

 जीवित या मृत, हलचल नहीं

खबरें सब मालूम है उसे,
वाकिफ है वह हर खबर से!
जनता की उठती हर कराहों से
बच्चियों पर बढ़ते बलात्कारों से।
खत्म हो रही जिंदगानियों से
चित्कारती कराहती महिलाओं से।
चेहरा विहीन पुलिस की दरिंदगियों से
लिजलिजे प्रशासन के हर क्रूर अट्ठाहस से।
सब सामान्य है उसके लिए
और उसके चापलूसों के लिए।
वह बड़ी बातें करता है परलोक की
पर लूट-खसोटता रहा है इस लोक की।
जनता नादान नहीं, ना ही थी कभी
फिर क्यों मुर्दा घर सी है शांति अभी।
तुम जीवित हो या मृत, हलचल भी नहीं
किसी भी जाने अनजाने लाश से कम नहीं!

जन प्रतिनिधि

जन प्रतिनिधि
हुज़ूर के बदले बदले से मिजाज लग रहे हैं
सत्ता पक्ष से "गुफ्तगू" की खबरें आ रही हैं।
सरकारी अधिकारी, जनता के चाकर आप
पर सत्ता दल की वफादारी कर रहे हैं आप।
चुनाव लड़ना है? अब जनता को भरमाओगे
जातिवाद धर्म, पाखंड और शंख बजाओगे।
चुनाव जीतोगे, जन प्रतिनिधि बन जाओगे
और जन धन दोनों के मालिक बन जाओगे।
प्रजातंत्र है, हक है तुम्हारा
पैसे कमाना, चुनाव लड़ना
जनता को आपस में लड़वाना
और जनतंत्र का तमाशा बनाना।