Thursday, 16 July 2020

हम और भगवान

हम और भगवान

हमारे पूर्वजों ने तुम्हें बनाया
और तू हमारा मालिक बन गया,
तेरे ठेकेदार चूस रहे खून हमारा
तेरी ही रक्षा के नाम पर!!

कितने कमजोर थे पूर्वज हमारे
अज्ञान, अंधविश्वासी, बेघर, बेचारे
पर हम तो उनसे भी गये गुजरे
आपस में ही मर कट जल मरे।

क्या कोई रास्ता नहीं है,
मुक्ति का, जिंदगी पाने का
जिने का, इंसान बनने का,
सिवाय इंकलाब का?

Monday, 6 July 2020

इंकलाब हो हमारा नारा

झूठों और गद्दारों के बीच,
शोषकों, मक्कारों के बीच,
सिसकता मजदूर, किसान,
बच्चे, महिला, बुढ़े, जवान।

जनता को किया लहू-लुहान,
अट्ठाहस कर रहे सारे धनवान,
बहू बेटियों तक को ये छोड़ें न,
पुलिस, प्रशासन सब हैं हैवान।

हजारों, लाखों और करोड़ों हैं जन,
बहुमत में, पर एक दूजे से अनजान,
धर्म, जाति, रंगभेद, देश "उनकी" देन,
पकड़ लिया हमने जैसे अपनी ही "देन"।

क्या छुटकारा मिलेगा, ओए भगवान,
या यह भी है एक काल्पनिक पकवान?
रे साथी, मरना भी तो है एक जरूरी काम,
मरने से पहले क्यों न अमर करें अपना नाम?

सब एक ही नांव में, क्यों ना मिलें हम?
एक सी हालात, फिर भी बिखरे हैं हम,
धूर्त है दुश्मन, क्यों बुद्धू रह गए हम?
एक बार तो आजमा लें, अपना दम।

इंकलाब हो हमारा नारा,
और दूजा नहीं कोई चारा,
उठो, आगे बढ़ो, देना है बलिदान,
इस मुक्ति का रास्ता नहीं आसान।