Saturday, 26 September 2020

अपने लिए तो लड़ता ही रहा हूँ

 अपने लिए तो लड़ता ही रहा हूँ

अपने लिए ही तो लड़ता रहा हूं
बचपन से अधेड़ावस्था, खुद के लिए
कभी दूध के लिए, तो कभी दारू के लिए
रोजगार के लिए, तो कभी नाम कमाने के लिए।
दायरा बढ़ा भी तो परिवार के लिए
कभी दोस्तों और खुद के मस्ती के लिए
चौराहे पर भीख मांगते बच्चों, छक्कों के लिए
पर हमेशा, गम हो या खुशी, सिर्फ मालिकों के लिए।
चमचागिरी तो भरी थी मेरे खून में
पहली कक्षा से अच्छी नौकरी पाने में
महिने के पहले दिन से पगार मिलने तक में
जरूरत पड़े तो दोस्तों के साथ घात तक करने में।
दास बन कर रह गया था पूंजी के गुलामी में
बचपन से जवानी तक के शिक्षा और अपने में
बुढ़ापे में आंखें तो खुली, पर खुली क्या वास्तव में
क्या रास्ता बदली जा सकती है, अब इस बचे जवानी में?

Thursday, 24 September 2020

गमों का पहाड़? : यहीं पे लड़ना है!!

 गमों का पहाड़?

गमों का पहाड़ तो नहीं टूटा है
पर अंतहीन टीले हैं कतारों में।
जब भी सम्भालता हूं दो चार को
दर्जनों खड़े हो जाते हैं कतार में।
सुझाव एक चतुर ज्योतिष का
ग्रहों को सीधा करवा लेने का।
पुछा सितारों का क्या बहुतेरे हैं
जो हर घर में दो चार सौ बैठे हैं?
ध्यानमग्न बाबा ने समझाया
बाहर देखना बंद कर, माया है।
अपने ही अंतर्मन का दर्शन कर
समस्या का वहीं पे समाधान है।
पर सरकार के डंडे, पेट का भूख
अंदर बाहर दोनों ही याद दिलाते हैं।
पहाड़, टीले, भूख, बिमारी असली हैं
इसी लोक में रहना है, यहीं पे लड़ना है।

Saturday, 19 September 2020

सड़क पे जींदगी

 सड़क पे जींदगी

एक सड़क आ रही थी, जा रही थी
पता नहीं कहाँ से, पर गतिमान थी।
घोड़ा बकरी, बैल गाड़ी चल रहा था
धूल से, दिन में शाम सा नजारा था।

चौराहे पर लाल बत्ती गुल था
सुबह शाम में ढल चुका था।
रेलमपेल बेकाबू हो चुका था
सड़क बहुत तेज हो चला था।

अचानक हुआ, ब्रेक की आवाज
धक्का, चिखने, दर्द की आवाज।
फिर शांति, पुलिस गाड़ी की आवाज
और एम्बुलेंस के सायरन की आवाज।

रोज की कहानी, पुरानी है
आम जनता, आम मौत है।
सड़क आ रही है, जा रही है
जनता आ रही है, मर रही है।

खत्म होगा मालिक पे एतबार?

 खत्म होगा मालिक पे एतबार?

बहुत हुआ बराबरी का नाटक
कानून के बराबरी का नाटक
धर्मनिरपेक्ष जाति विहीन ढोंग
और प्रजातंत्र, न्याय का ढोंग।

अनपच हो गया है मझे  जुमलों से
खाली पेट में उठते सुखे मरोड़ों से
झूठ देशी और विदेशी बकवासों से
मक्कारी, बलात्कार और जुल्मों से।

खत्म हो रहा मेरा सब सपना
बच्चों का खेलना और  पढ़ना
बढ़ा बुढ़ों का दर्द से कराहना
औरतों की इज्जत से खेलना।

छलकेगा तेरे सब्र का घड़ा कब
टूटेगा भ्रम का मकड़जाल कब
खत्म होगी अकेलेपन की दीवार
और हत्यारे मालिकों पे ऐतबार?

उठे हैं करोड़ों क्रांतिकारी

उठे हैं करोड़ों क्रांतिकारी

अच्छा हिन्दू या सिख हो सकता है
मुसलमान या ईसाई  हो सकता है,
जैन, बुद्ध और बहाई हो सकता है
पर खालिस इंसान बनना कठिन है।

एक अच्छा इंसान जाति धर्म से परे है
21 वीं शताब्दी है विज्ञान और तर्क है,
उसे नास्तिक भगत सिंह  बनना होगा
समाजवाद, क्रांति भी  सिखना होगा।

नया जमाना, नया समय नयी सोच है
युवा पीढ़ी नया जोश, उफान उठा है,
मजदूर, किसानों और क्षात्रों में रोष है
उठे हैं करोड़ों क्रांतिकारी दावानल है।

अधेड़ जोड़े


 एक जोड़े से मिला वे दोनों अधेड़ हैं

बच्चे सेटल्ड और खुद चिंता मुक्त हैं
कभी कभी बाहर  भी खाना खाते हैं
हजार बारह सौ खर्च कर ही देते हैं।

बाजार भी जाते हैं,  शौपिंग कर  लेते हैं
कभी-कभी गहने तक भी खरीद लेते हैं
देश और आर्थिक मंदी की चिंता नहीं है
दरिया दिल, मस्त हैं, जीवन चल रहा है।

पर कामगारों, ठेलेवालौं को न भाव देते
भिखारियों को समाज पर बोझ समझते
खुद भगवान, अल्लाह, गौड के खास हैं
बाकि को देखते जैसे समाज पे बोझ हैं।

भिन्न-भिन्न रुप

भिन्न-भिन्न रुप

कोई दाढ़ीवाला है, तो कोई तिलकधारी

कोई सुट बूट वाला, तो कोई लंगोटधारी
कोई टोपी वाला है, तो कोई खड़ाउधारी।

पर भगवान, अल्लाह, गौड सबका एक
पैसा वाला मालिक भी तो सबका है एक
बाहर से अनेक, पर अंदर से सब हैं एक।

हम सब बंदर, मदारी हो गये हैं सब एक
हिंदू मुसलमान, सिख इसाई, बने अनेक
लूट रहे हैं, पर खुश हैं, लूट रहे हैं अनेक।

क्या हो सकते हैं हम सब फिर से एक
दुश्मनों को कर दें नेस्तानाबुद, परस्त
हो हमारा आज और कल हमारे हाथ।