Sunday, 15 November 2020

जिंदगी: क्या बकवास है!

 जिंदगी: क्या बकवास है!


लालू आया लालू गया
नीतिश आया नीतिश ना गया
आयाराम आया और आयाराम गया
तेली कल्लू, भुजिया न ही आया न ही गया।

कोई और ना ही आया और ना गया
जनता का न आना हुआ, न जाना हुआ
जहाँ था वहीं पे ठिठुरता और ठहरा सा हुआ
लुटता, शर्माता, और ठगा सा महसूसता हुआ।

प्रजातंत्र और वतन को बचाता हुआ
खुद को सम्विधान की बली पर चढ़ाता हुआ
अगले जन्म में राजकुमार की कल्पना देखता हुआ
इस जन्म, सम्मान और मुर्खता की सुली पर चढ़ गया।

Sunday, 1 November 2020

अकेलापन

                                     अकेलापन

पहले डर लगता था अकेले रहने में
अब आदत सी हो गयी है अकेले रहने में
दोस्तों की भरमार, रैलमपेल थी, हर माहौल में
पर लगता है डर और घुटता है दम अब हर भीड़ में।
यह भीड़ नहीं हैं अजनबियों का
अनायास दर्शकों का, तमाशबीनों का
मगर आतंकवादियों का, खुद अपनों का
सुलझे हुए गद्दारों का, हत्यारौं, मक्कारों का।
भीड़ है कुछ खास मकसद के साथ
सरकार है इस "खास" मकसद के साथ
सब पैसे और खून के लिए पागल हो रहे हैं
लूट, दंगे, बलात्कार इनके हथियार बन गये हैं।
क्या भीड़ का मुकाबला भीड़ से
क्या डंडे का जवाब हम भी दें डंडे से
या फिर फासीवाद का मुकाबला क्रांति से
पूंजीवाद को नेस्तानाबुद करें समाजवाद से?