Sunday, 3 January 2021

दुश्मन घर में था

 मिर्ज़ा ग़ालिब ने कहा है:

उमर भर ग़ालिब यही भूल करता रहा
धूल चहरे पर थी और आएना साफ़ करता रहा|
मैं कहता हूँ:
उमर भर हम यही भूल बार बार करते रहे
दुश्मन घर में था, पड़ोसी को गलियाते रहे।

Tuesday, 15 December 2020

मांगो नहीं लड़ो

 मांगो नहीं लड़ो

आरक्षण मांगते हो, बेरोजगारी भत्ता मांगते हो
रोजगार है कहां, जिसके लिए भीख मांगते हो
मांगो तो खुद के लिए नहीं, सबके लिए मांगो
दिल खोलकर, सौ प्रतिशत रोजगार मांगो।
अब हक मांगना भीख मांगने से बदतर है
समय का तकाजा है, लड़ के लेना सिख
जिंदगी जीना है तो संघर्ष करना सीख
जिने से पहले शहादत देना सिख।
मांगने और मांगने में बड़ा अंतर है
अकेला मांगना गिड़गिड़ाना है
मिल कर मांगना अधिकार है
हक़ छिनना पड़ता है।

Wednesday, 2 December 2020

क्या था क्या हो गया

 क्या था क्या हो गया:

मांगा तो बस रोजगार ही था
पाकिस्तानी, देशद्रोही घोषित कर दिया
बच्चों के लिए शिक्षा और परिवार के लिए दवा
जेल के अंदर डाल दिया और यूएपीए ठोक दिया।
जो वादा किया था, जुमला निकला
खाना, पहनावा पर अधिकार ना रहा
जो कल हमारा था, वो सरकार का हो गया
जो सरकारी था, वो आज अम्बानी का हो गया।
क्या बोलूँ, क्या पढ़ूं,
किससे प्यार, शादी करूं
धर्म पूंजी के दल्ले तय करेंगे
और न्यायाधीश मोहर लगायेंगे।

Sunday, 15 November 2020

जिंदगी: क्या बकवास है!

 जिंदगी: क्या बकवास है!


लालू आया लालू गया
नीतिश आया नीतिश ना गया
आयाराम आया और आयाराम गया
तेली कल्लू, भुजिया न ही आया न ही गया।

कोई और ना ही आया और ना गया
जनता का न आना हुआ, न जाना हुआ
जहाँ था वहीं पे ठिठुरता और ठहरा सा हुआ
लुटता, शर्माता, और ठगा सा महसूसता हुआ।

प्रजातंत्र और वतन को बचाता हुआ
खुद को सम्विधान की बली पर चढ़ाता हुआ
अगले जन्म में राजकुमार की कल्पना देखता हुआ
इस जन्म, सम्मान और मुर्खता की सुली पर चढ़ गया।

Sunday, 1 November 2020

अकेलापन

                                     अकेलापन

पहले डर लगता था अकेले रहने में
अब आदत सी हो गयी है अकेले रहने में
दोस्तों की भरमार, रैलमपेल थी, हर माहौल में
पर लगता है डर और घुटता है दम अब हर भीड़ में।
यह भीड़ नहीं हैं अजनबियों का
अनायास दर्शकों का, तमाशबीनों का
मगर आतंकवादियों का, खुद अपनों का
सुलझे हुए गद्दारों का, हत्यारौं, मक्कारों का।
भीड़ है कुछ खास मकसद के साथ
सरकार है इस "खास" मकसद के साथ
सब पैसे और खून के लिए पागल हो रहे हैं
लूट, दंगे, बलात्कार इनके हथियार बन गये हैं।
क्या भीड़ का मुकाबला भीड़ से
क्या डंडे का जवाब हम भी दें डंडे से
या फिर फासीवाद का मुकाबला क्रांति से
पूंजीवाद को नेस्तानाबुद करें समाजवाद से?

Thursday, 29 October 2020

गर मिल जाये जिंदगी दुबारा

 गर मिल जाये जिंदगी दुबारा

याद है जहां तक वहीं से जीना चाहता हूं
बड़ी नहीं, छोटी मोटी गलतियाँ सुधार सकूं
बड़ा हो गया खास अनुभवी अब तो हो गया हूं
नयी जिंदगी, नये तरीके, नयेपन से अब जी सकूं।
मारा था छोटे भाई को, मारूं ना दुबारा
टिफिन बाद ही भागा जाता था स्कूल से
अब तो जाऊं ही ना स्कूल में कभी शुरू ही से
पास ही ना फटकूं उस सहपाठी के, जिसने था मारा।
जवानी में चक्कर लगाये थे, बनने को नौकर
भटका सारा जहां, इंटरव्यू दिये, हूये सारे बेकार
शादी की उनका सुंदर मुस्कान और मुखड़ा देख कर
इस बार ना ही शादी करूं ना ही बनुं किसी का चाकर।
भले ही भगत सिंह ना कभी बन पाऊं
पर केवल क्रांति का रास्ता ही मैं अपनाउं
पर सब को पता है, ख्याली पुलाव है यह सब
यहीं से आगे बढ़ानी है, अपनी जिंदगानी अब।

हमारे हत्यारे

 हमारे हत्यारे

हमारे हत्यारे ढूंढ रहे थे हमें
जा पहुंचे उन्हीं के मयखाने में
नशे में धूत्त थे, सुपारी के पैसों में
पता न था पहुंच गये मौत के गोद में।
बांछें खिल गयीं, जब पहचाना हमें
हलाल से पहले, भर ली आगोश में हमें
बोला बहुत लम्बी उमर है, मुबारक दी हमें,
बताया बस अभी अभी तो याद कर रहे थे तुम्हें।
एक जाम भी सरकाया हमारे पीने के लिए
खुद लगाया जाम होठों से, ली घूंट मजे के लिए
और फिर सिखाई मुझे तरजीह, जाम पीने के लिए
बोला, जाम उठा, बोलो "तुम्हारी लम्बी उम्र के लिए"।
पता चला, कातिल भी वही, मुंसिफ भी वही
भाग्य भरोसे छोड़, लगा ली मैंने भी दो चार वहीं
नशा टूटा, नींद टूटी जैसे ही विदेसी मुर्गे ने बांग दिया
क्या फर्क पड़ता है, जिंदगी बची और मुफ्त में देसी पिया।