मिर्ज़ा ग़ालिब ने कहा है:
उमर भर ग़ालिब यही भूल करता रहा
धूल चहरे पर थी और आएना साफ़ करता रहा|
मैं कहता हूँ:
उमर भर हम यही भूल बार बार करते रहे
दुश्मन घर में था, पड़ोसी को गलियाते रहे।
मिर्ज़ा ग़ालिब ने कहा है:
मांगो नहीं लड़ो
क्या था क्या हो गया:
जिंदगी: क्या बकवास है!
अकेलापन
गर मिल जाये जिंदगी दुबारा
हमारे हत्यारे