Tuesday, 26 April 2016

मेरे क्रोध की लपटें - एक फ़िलिस्तीनी स्त्री!

मेरे क्रोध की लपटें - एक फ़िलिस्तीनी स्त्री (अनुवाद : वीणा शिवपुरी)
तुमने मुझे बाँधा है
जकड़ा है ज़ंजीरों में
पर लपटें मेरे क्रोध की
धधकती हैं, लपकती हैं।
नहीं कोई आग इतनी तीखी
क्योंकि मेरी पीड़ा के ईंधन से
ये जीती हैं, पनपती हैं।
आग को ठण्डाने के लिए
हँस सकती हूँ मैं भी
उन लोगों की ताक़त पर
हैं नहीं जो इंसान
कहलाने के काबिल भी।
शरीर बाँध सकते हो,
बेड़ियों से, जंज़ीरों से
शब्दों को बन्दी बनाना नहीं मुमकिन
वो तो उड़ जायेंगे
मुक्त पंछियों से!!

Thursday, 21 April 2016

ओ मजूरा उठ मजूरा बढ़ मजूरा चल मजूरा

ओ मजूरा उठ मजूरा बढ़ मजूरा चल मजूरा
समर-संघर्ष कर मजूरा,क्रांति बिगुल बजा मजूरा।
अब रुको रुको नहीं अब झुको झुको नहीं
एक क्षण की देरी भी युगो का फासला बनेगा
हाँ तू शस्त्र उठा मजूरा क्रांति बिगुल बजा मजूरा।
प्रजातंत्र- लुटेरा का नापाक इरादा ध्वस्त कर
पूंजीवादी सत्ता के मनसूबे को चूर चूर चूर कर
हर चाटुकारों को कुचल क्रांति बिगुल बजा मजूरा।
देखो ठग दाढ़ी बढ़ा धर्मांध है फिराक में
नफरत की जहर-आग को फैला रहा समाज मे
जहरीला धर्मांध कुचल क्रांति बिगुल बजा मजूरा।

Vinay Krishna KaleBadal मजूरा से

Sunday, 17 April 2016

दुनिया भर में डर

एदुआर्दो गालेआनो की कविता — दुनिया भर में डर
जो लोग काम पर लगे हैं वे भयभीत हैं
कि उनकी नौकरी छूट जायेगी
जो काम पर नहीं लगे वे भयभीत हैं
कि उनको कभी काम नहीं मिलेगा
जिन्हें चिंता नहीं है भूख की
वे भयभीत हैं खाने को लेकर
लोकतंत्र भयभीत है याद दिलाये जाने से और
भाषा भयभीत है बोले जाने को लेकर
आम नागरिक डरते हैं सेना से,
सेना डरती है हथियारों की कमी से
हथियार डरते हैं कि युद्धों की कमी है
यह भय का समय है
स्त्रियाँ डरती हैं हिंसक पुरुषों से और पुरुष
डरते हैं निर्भय स्त्रियों से
चोरों का डर, पुलिस का डर
डर बिना ताले के दरवाज़ों का,
घड़ियों के बिना समय का
बिना टेलीविज़न बच्चों का, डर
नींद की गोली के बिना रात का और दिन
जगने वाली गोली के बिना
भीड़ का भय, एकांत का भय
भय कि क्या था पहले और क्या हो सकता है
मरने का भय, जीने का भय

राजे ने अपनी रखवाली की: सूर्यकान्त त्रिपाठी ‘निराला’

राजे ने अपनी रखवाली की;
किला बनाकर रहा;
बड़ी-बड़ी फ़ौजें रखीं ।
चापलूस कितने सामन्त आए ।
मतलब की लकड़ी पकड़े हुए ।
कितने ब्राह्मण आए
पोथियों में जनता को बाँधे हुए ।
कवियों ने उसकी बहादुरी के गीत गाए,
लेखकों ने लेख लिखे,
ऐतिहासिकों ने इतिहास के पन्ने भरे,
नाट्य-कलाकारों ने कितने नाटक रचे
रंगमंच पर खेले ।
जनता पर जादू चला राजे के समाज का ।
लोक-नारियों के लिए रानियाँ आदर्श हुईं ।
धर्म का बढ़ावा रहा धोखे से भरा हुआ ।
लोहा बजा धर्म पर, सभ्यता के नाम पर ।
ख़ून की नदी बही ।
आँख-कान मूंदकर जनता ने डुबकियाँ लीं ।
आँख खुली– राजे ने अपनी रखवाली की ।

Tuesday, 5 April 2016

हिटलर के तम्बू में

हिटलर के तम्बू में
नागार्जुन
आदमखोर ये यहां भी हो सकता है!
आदमखोर
ये यहां भी हो सकता है!
अब तक छिपे हुए थे उनके दाँत और नाख़ून ।
संस्कृति की भट्ठी में कच्चा गोश्त रहे थे भून ।
छाँट रहे थे अब तक बस वे बड़े-बड़े क़ानून ।
नहीं किसी को दिखता था दूधिया वस्‍त्र पर ख़ून ।
अब तक छिपे हुए थे उनके दाँत और नाख़ून ।
संस्कृति की भट्ठी में कच्चा गोश्त रहे थे भून ।
 
मायावी हैं, बड़े घाघ हैं, उन्हें न समझो मन्द ।
तक्षक ने सिखलाए उनको ‘सर्प नृत्य’ के छन्द ।
अजी, समझ लो उनका अपना नेता था जयचन्द ।
हिटलर के तम्बू में अब वे लगा रहे पैबन्द ।
मायावी हैं, बड़े घाघ हैं, उन्हें न समझो मन्द ।
Fir se lotenge bhediye
पहले वे आये कम्युनिस्टों के लिए
और मैं कुछ नहीं बोला
क्योंकि मैं कम्युनिस्ट नहीं था।
फिर वे आये ट्रेड यूनियन वालों के लिए
और मैं कुछ नहीं बोला
क्योंकि मैं ट्रेड यूनियन में नहीं था।
फिर वे आये यहूदियों के लिए
और मैं कुछ नहीं बोला
क्योंकि मैं यहूदी नहीं था।
फिर वे मेरे लिए आये
और तब तक कोई नहीं बचा था
जो मेरे लिए बोलता।
पास्टर निमोलर
(हिटलर के शासनकाल के एक कवि और फासीवाद विरोधी कार्यकर्ता)