Wednesday, 27 February 2019

नहीं लड़ेंगे युद्ध तुम्हारे लिए!

युद्ध किसके लिए और फिर किस के काम की?
सेना किस के लिए, देश या देश के मालिक की?
मरते सिपाही, मुनाफा कमाता हथियार विक्रेता,
टैक्स भरती जनता, धनी होता पूंजीपति व नेता!
और ये सारे बहादुर सिपाही पैदा होता हैे कहाँ?
हमारे ही परिवार में पैदा हुआ, मरेगा भी यहां!
वक्त है सोचने का, कौन करता है युद्ध पैदा?
कौन बनाता आतंकी और कौन है पैसा देता?
आखिर क्यूँ सारी दुनिया में माहौल है युद्ध का,
और हर रोज मर रहे सैकड़ों सैनिक, जनता!!
तालियाँ बजाते लोग पर विलखती माँ, विधवाएं,
फूल माला डालते जेनरल व राजनैतिक भडुए!
मुनाफा बढ़ाते और अगले युद्ध की प्लानिंग करते,
मजदूर, किसान, सैनिक के खून से होली खेलते!!
गिद्ध, चील और सेना के "मालिक" जश्न मनाते,
हाय रे इन्सान, तुम्हारे ही मौत पे मजा करते!!
गीदड़, लोमड़ी और सियार निकले लाश लूटने,
मौत के सौदागर के पीछे चल पड़े तुम रोटी लेने!
उन्हीं के पीछे हो लिए, पैसों के चाँद टुकड़ों के लिए,
अब तो बोल, नहीं लड़ेंगे युद्ध, लड़ेंगे शांति के लिए!

Monday, 25 February 2019

मैं खुद का ही ना रहा

छोटा से बड़ा हुआ, खूब पढ़ा-लिखा,
खेला भी और कइ मेडल भी कमाया!
खुद व मॉ बाप का नाम रौशन किया, 
कक्षा में तो कइ बार अव्वल भी हुआ!
प्रतियोगिता में सफलता हासिल हुई,
नौकरी पायी, पर आजादी खत्म हुई!
पेट के ख़ातिर किसी और का हो गया,
खुद का न रहा, न मेरा खुदा ही रहा!!
अपने घर वालों, मित्रों का भी न रहा,
किसी मालिक का नौकर बन गया!!
जब खुद से ही जुदा-सा हो गया,
तब खुद पे एतबार भी न रहा!!
जब मैं खुद का ही न बन पाया,
तब मैं खुद का भी न रह पाया!
मालिक के लिए मशीन बन गया,
मैं किसी का भी तो न बन पाया!

Friday, 15 February 2019

मजदूर महिला का हल्ला बोल

खपड़ैल स्कूल से बाहर गयी नहीं,
पांच-सात के आगे कभी पढ़ी नहीं,
अंग्रेजी छोड़़ो, हिंदी बोल पाती नहीं,
भरपेट खाना, नये कपड़े पाती नहीं!
पर मेहनत कर खाती, बच्चों को पालती,
पति भी साथ है, सपने भी जरूर देखती,
ऐसा समय आयेगा, बच्चे बड़े स्कूल जायेंगे,
काम करेंगे, इज्जत भरी जिंदगी भी जियेंगे!
पर कैसे, यह उसके समझ से परे था,
पति श्रमजीवी, पर वह भी बिचारा था,
बच्चों के हाथ में दिखा एक सहारा था,
हाथों में एक लाल झंडा लहरा रहा था!

मैं इन्सान नहीं, सिर्फ एक मजदूर हूँ!

ना तो मैं ज़िंदा हूं, ना ही कोई लाश,
ढांचे में हाड़ तो है, पर नहीं है मांस!
जी, लोग तो मुझे इंसान ही कहते हैं,
पर बच्चे मुझे कार्टून ही समझते हैं!!
ना ही मैं जवान हूं, ना ही हुआ हूँ बूढ़ा,
देखी है सिर्फ 35-36 गर्मी और जाड़ा!
ना मैं कोई हिन्दू हूं, ना ही कोई मुसलमान,
ना ही मैं कोई दलित हूं ना ही कोई बाम्हन!
जी हाँ, मनुष्य योनी में ही तो जन्म लिया था, 
पर इंसान नहीं, बना सिर्फ एक मजदूर था! 
पूंजीवादी शोषण का हूं सिर्फ एक नमूना, 
चूस लिया जिसने मेरा खून और पसीना!
बचाना है गर मेहनतकश, मानवता, धरती को,
ध्वस्त करो पूंजीवाद, दफन करो पूंजीवाद को!

Thursday, 7 February 2019

कैदी की ललकार

समाज-देश का दुश्मन कौन?
हम मुर्ख, गंवार और जाहिल,
या बड़े पदों पर बैठे काहिल?
हम "भ्रष्ट-अपराधी" जिन्हें किया अंदर,
या खरबों के वो मालिक, जो हैं बाहर?
सरकार, पुलिस और प्रशासन उनके,
सेना, न्यायालय व कारखाना उनके!
मजदूर और किसानों का श्रम उनका,
पैदावार और उपर से मुनाफा उनका,
पर क्या अपराधी होना सिर्फ हमारा?
अगर विद्रोह करें तो डंडा गोली उनकी,
पर छाती हमारी, मरे बच्चे बीबी हमारी,
नहीं मानेंगे अब हुकूमत, न्याय तुम्हारी!
करोड़ों हम, लेंगे सत्ता खुद के हाथों में,
अपना श्रम और उत्पाद अपने हाथों में!
अब हम नहीं, तुम सारे होगे जेल में!
सिखोगे अब श्रम की महत्ता अंदर में!
साथियों, कोई दूसरा विकल्प नहीं है!
नारा दो हम एक हैं, एक हैं, एक हैं!!