Monday, 27 February 2017

महासागर: लिथुआनिया की कविता

Kavita Krishnapallavi (On FB)
महासागर
लिथुआनिया की कविता
-- एदुअर्द्स मीज़ेलाइतिस
महासागर! ...
उतना ही पुरातन जितनी हमारी यह दुनिया,
जो कविताएँ हैं इसके बारे में वे भी पुरानी हैं,
फिर भी यह लगातार गतिमान है,
अनवरत गतिमान,
और मैं महसूस करता हूँ इसके साँचे में ढले एक टापू की तरह।
मैं मानता हूँ हम दुहराते हैं खुद को, घिसे-पिटे हैं हम,
शायद बचकाने ही हैं सब कुछ के बावजूद,
लेकिन फिर भी क्‍यों न तुलना करें महासागर से मानव जीवन की?
यदि राष्‍ट्र और लोग हैं टापुओं की तरह,
तब क्‍यों न तुलना करें महासागर से?
कवियों ने हमें बताया ''जीवन एक असीम महासागर है'',
और नहाते रहे अपने ही आँसुओं के डबरे में।
सो हम इस महासागर में अकेले यात्रा करने और
अपने डर पीछे छोड़ देने की
भ्रान्‍त धारणा को अनावृत करते हैं...
कितना प्‍यारा दृश्‍य!
इसकी स्‍तब्‍धकारी महातरंगों को देखने
या इसकी हवा भी अपनी छाती में भरने के बाद
आप यहाँ से हटना नहीं चाहते
क्‍योंकि इसके खारे पानी का स्‍वाद बाँध लेता है आपको
और इसके लहरों की अनुगूँजें आप हृदय में सुनते रहते हैं
जैसे कि सीपी की आवाज़ें...
उमड़ो, लहराओ, ओ समुद्र!
कभी नहीं चखी है तुमने यह आज़ादी, यह सहजता...
हालांकि तुम्‍हारी गहराइयों में पड़े हुए हैं कुछ जहाज निस्‍पन्‍द
नये जलपोत -- तुम्‍हारे गौरव! अभिनन्‍दन करते हैं समीर का...
उमड़ो, लहराओ, जनगण की महातरंगो!
उमड़ो, लहराओ, मानव जाति के महासागर!
मैं क्‍या हूँ नहीं जानता मैं
एक छोटी सी नाव या एक टापू -- एक ठोस टुकड़ा,
परवाह न करो, बहुमूल्‍य जीवन, मत बख्‍शो मेरी छाती,
अनवरत, मेरे हृदय पर, जैसे कि किसी चट्टान पर
चोट करो अपनी लहरों से...
कायल हूँ मैं इस प्रचण्‍ड मानव महासागर का,
हुलसता हूँ मैं महाद्वीपों को जलप्‍लावित करती इसकी लहरों से।
भले ही कुछ दम्‍भी तिरस्‍कार करें इन कलाहीन विचारों का,
लेकिन मेरे लिए जीवन -- मानवजाति -- और बेचैन महासागर
एक बिम्‍ब है जो कभी पुराना नहीं पड़ता
और सभी विलक्षण -- सुस्‍पष्‍ट बिम्‍बों
से अधिक प्रदीप्‍त लगता है हमेशा ही...
उमड़ो, लहराओ, ओ सागर जीवन से भरपूर!
उमड़ो, लहराओ तुम, जनगण की महातरंगो!
देखो, काव्‍यात्‍मक अनुरक्ति के हाथों से
हम गतिमान करते हैं धरती माँ को,
अनवरत गतिमान...

Wednesday, 1 February 2017

कविता कैसा हो: कविता कृष्णपल्लवी

" समाज की तमाम कुरूपताओं को ''कुरूप'' क्रान्तियों से ही दूर किया जा सकता है और ''कुरूप'' कविताएँ ही ऐसे समय में ज़रूरी औजारों या रोजमर्रे की जिन्‍दगी में बरते जाने वाले सामानों की तरह काम आयेंगी।"
बहुत सही! "कुरूप" कवितायेँ खास वर्ग हित को साधती हैं और सुन्दर होती हैं! 1956 के हार के बाद इतिहास फिर करवट ले रहा है, हमारे पक्ष में, हर छेत्र और हर जगह दिख रहा है!

Kavita Krishnapallavi
कविता में समस्‍त मानवता के लिए दु:खी-चिन्तित और उदास दिखने वाले सूफियाना मिजाज़ वाले कवि मुझे तो चालाक और पाखण्‍डी जान पड़ते हैं। जहाँ कुछ मनुष्‍य ही सामाजिक-राजनीतिक शक्तियों के रूप में मानवता के शत्रु हैं, जहाँ पूँजी की अंधी हवस पृथ्‍वी पर बहुसंख्‍यक जनों के ऊपर दिनरात हाड़तोड़ मेहनत, नर्क के तहखानों जैसी जिन्‍दगी, भुखमरी, बीमारी आदि-आदि के रूप में जुल्‍म की बरसात कर रही है और थोड़े से लोगों को तरह-तरह के वैभव-विलास के सरंजाम मुहैया करा रही है, वहाँ कविता से बेहद कलात्‍मक तराश के साथ आध्‍यात्मिक चिन्‍ताओं एवं सौन्‍दर्य-मीमांसाओं के बजाय मुखर होकर पक्ष लेने का आग्रह तो किया ही जाना चाहिए। समाज की तमाम कुरूपताओं को ''कुरूप'' क्रान्तियों से ही दूर किया जा सकता है और ''कुरूप'' कविताएँ ही ऐसे समय में ज़रूरी औजारों या रोजमर्रे की जिन्‍दगी में बरते जाने वाले सामानों की तरह काम आयेंगी।
अक्‍सर पाया जाता है कि कविता में जो कवि बहुत दु:खी, उदास, खिन्‍न, अन्‍यमनस्‍क और अतिसंवेदनशीलता के कारण मनुष्‍यता के तमाम दुखों को लेकर अवसादग्रस्‍त मुद्रा में दीखते हैं, जिन्‍दगी में वे व्‍यवस्थित, सुरक्षित, पुरस्‍कृत, सुविधा सम्‍पन्‍न और नितान्‍त व्‍यावहारिक होते हैं, यहाँ तक कि कई बार हिसाबी-किताबी, दंद-फंदी और तिकड़मी भी होते हैं।
जब लोगों के लिए जीवन विकट हो गया हो तो भाषाई खिलंदड़ापन कितना घिनौना लग सकता है, इसे सुधीश पचौरी की टिप्‍पणियों को पढ़कर जाना जा सकता है, शालीन-कुलीन-निष्‍कलुष कला-साहित्‍य विमर्श और प्रकृति वर्णन कितने शातिर और बेरहम लगते हैं, इसे अशोक बाजपेयी की अखबारी टिप्‍पणियों और प्रयाग शुक्‍ल के यात्रा-वृत्‍तांतों को पढ़कर जाना जा सकता है। प्रकाशकों के भव्‍य आयोजनों में पुस्‍तक-विमोचनों, पुरस्‍कार एवं सम्‍मान समारोहों में उपस्थित सुखी-संतुष्‍ट चेहरे बताते हैं कि साहित्‍य की दुनिया किस कदर गम्‍भीर रूप से बीमार है। कविता अपने समय-समाज से कटकर कितनी पाखण्‍डी और विकर्षक हो सकती है, यह हिन्‍दी कविता की मुख्‍य (चालू) धारा को देखकर ही समझा जा सकता है।

STALIN

Late Comrade Gopal Bhattacharya wrote some poems and got them published in form of a small book, "No Rifle In My Hand"!
His first one, "STALIN" is here:
No rifle in my hand
There’s only a book
And red letters on it: STALIN
If I were killed on
Zebra-crossing
Oh passers- by, whoever may you be
Pick the book up with you_
Don’t know about a rifle?
Read it. Can’t read letters?
Give it to your brother then
To my brother_ yes.
The man said: For all
The olive tree offers its fruit
He wanted: Every child to giggle
Being a joy to his mother
Wrote he: Those who are bending
Their head to-day
Must hold their head high
Against terrible frown.
He was from Kremlin, Joseph
An alert sentinel_ restless guy
Close friend of workers and peasants
throughout the world.
Exhorted loudly: Workers and peasants
Do have your legitimate rights
Get yourself armed.
No weapon in my hand
But only a book I’ve
The group of executioners
Halted frightfully
And the fascists withdrew in retreat
And the hired touts proved futile
With their foolish tricks
And the shrewd ruffians freezed out
In crowd
Only a masked few took up the reigns.
And so he was killed practically
Followed by further killings_
And if I were killed
You’d find in vivid the book: STALIN.
Just as he fared face-to-face
Against the cannibals
Under Chamberlain
In fighting-attire, a soldier
Protecting the country from repression
and want of regeneration
Yes, ready with arms.
I’ve no military-dress but
Armed with a book
Living on the wings of confidence
and hope
For moulding a verse
And getting news and messages
from various quarters
For getting prepared
And if you ask for more
I must say: yes,
I’ve a definite direction_ STALIN