Friday, 31 May 2019

चुनाव और क्रांतिकारी अवसर:

चुनाव और क्रांतिकारी अवसर:
काफी अवसर था, हमारे लिए इस चुनाव में,
कुछ कर गुजरने को, कुछ कर दिखाने को!!
चुनाव में "चुनाव" का ही तो इस्तेमाल करना था, 
चुनाव को मजाक बनाने वाले को तो दिखाना था!
इन्हें चुनाव से नहीं, समाजवादी क्रांति से हराना था,
चुनाव उनका दिखावा था, हमारे लिए भी बहाना था!
पर हम एक हो ना सके, कांग्रेस-भाजपा में रह गये,
मारना तो दुश्मन को था, पर आपस में कट मर गये!
दुश्मनों की अंतिम जीत और हमारी श्रद्धांजली है?
पर भविष्य हमारा है, हमने इतिहास से सीख ली है!
दोस्त, यह "हार" हार नहीं, सिर्फ एक पड़ाव था,
उठो तुम, रुको भी, ले लो एक दम, ठहराव था!
लड़ाई अभी बाकी है, जीत तुम्हारी है, बढ़े चलो,
क्रांति की ललकार है, हम सब एक हैं, बढ़े चलो!
सुधार नहीं, क्रांति चाहिए, भीख नहीं, अधिकार लेंगे!
अब तुमसे "विकास" नहीं, छुटकारा लेकर ही रहेंगे!!
खुद के हाथों में अधिकार चाहिए!
पूंजीवाद नहीं, समाजवाद चाहिए!

जुमला ले लो:

जुमला ले लो:
बादल से रोक दी रडार के तरंगों को,
पाक और चीन के हौवा से भूख को!
रोजगार खत्म करी, आह भी न निकला, 
इस बार राम मंदिर का था सीधा हवाला!
बच्ची के बलात्कारी को भी बचा लिया,
"हिंदू राष्ट्र" का सपना देखा, दिखाया!!
देश, धर्म खतरे में और मुनाफा बढ़त में,
मजदूरों किसानों धैर्य रखो अपने मन में!
आज नहीं तो कल आयेगी तुम्हारी बारी,
माफ करना, अभी है मालिक की बारी!
भुलो नहीं तुम, हम तो हैं तुम्हारे मालिक,
पर हमारे भी हैं मालिक, देश के मालिक!
हम हैं मालिक के सही "चतुर" मैनेजर,
पर तुम बने रहो हमारे "भक्त" चाकर!!
देश, धर्म के नाम पर करेंगे पुरा व्यभिचार,
इस बार जुमला ले लो, देखेंगे अगली बार!

चुनाव:

भड़ुआ बना दिया मजदूरों व किसानों को,
जहाज, सुई और अनाज बनाने वालों को!
चुनाव तुम्हारा था, जम कर नाचे गाये थे हम,
उल्लू थे नहीं, पर पुरी बन कर रह गये हम!!
सोचा था कि सतर्क रहेंगे हम, पर हो न सके,
पैसे और धर्म पर लूट गये हैं, हम बच न सके!
क्या सही में मर-खप चुके हैं हम?
एक जींदा लाश बन घुम रहे हैं हम?
अब तो लूट दिखने लगा है,
अंधेरा छंटने लगा है,
दुश्मन दिखने लगा है,
लाल सबेरा होने लगा है!
रुकना नहीं, अंतिम लड़ाई है,
आधा नहीं, पुरा करना है,
गुलामी कम नहीं,
पुरा खत्म करना है!

दुश्मन इंतज़ार करते रहे

दुश्मन इंतज़ार करते रहे कि हम टूट जाये,
पर जुल्म बर्दाश्त कर हम पत्थर बन गये!

सहारा न था किसी अदृश्य भगवान का,
बस साथ था तो एक मजदूर साथी का!

मंद जोश को राख न समझ

मंद जोश को राख न समझ, हवा ही तो चाहिए,
धधक रहा है ज्वाला, एक और फूंक तो दे दे तू!
सुखा जंगल है, एक चिनगारी ही तो चाहिये,
हाथ उठा, और एक आवाज तो दे ही दे तू!!

जिंदगी बेमानी था पर:

कुछ भी नहीं किया जिंदगी में,
सिवाय खाया पिया और मौज किया,
कभी गजालत की जिंदगी, तो कभी रोया!
तभी मिला एक किताब था,
"कम्यूनिस्ट मैनीफेस्टो" नाम था,
और तब जिंदगी ने जबर्दस्त पलटी लिया!
इस अधेड़ उम्र में नयी दिशा दी,
मजदूर होने का अहसास करवाया,
और मुझे एक क्रान्तिकारी कम्युनिस्ट बनाया!