Sunday, 27 November 2016

हम जिन्दा हैं!

जिन्दा हैं फिदेल 
चे भी और हो ची मिन्ह भी
माओ भी, स्टालिन भी
जिन्दा हैं लेनिन भी 
मार्क्स और एंगेल्स भी
मोर्गन और डार्विन भी जिन्दा हैं
वे तमाम लोग जिन्दा हैं
जिन्हों ने मनुष्य जाति की
प्रगति के पथ पर नए सोपान रचे हैं
तुम पूछोगे वे जिन्दा हैं तो कहाँ हैं
वे मेरे भीतर जिन्दा हैं,
वे हर मेहनतकश में जिन्दा हैं
वे जिन्दा रहेंगे तब तक
जब तक जीवित है मनुष्य जाति
जब तक जीवित है मनुष्य जाति का इतिहास
---- दिनेशराय द्विवेदी

Wednesday, 16 November 2016

बेर्टोल्ट ब्रेष्ट की कविता – हम राज करें, तुम राम भजो!

बेर्टोल्ट ब्रेष्ट की कविता – हम राज करें, तुम राम भजो!

खाने की टेबुल पर जिनके
पकवानों की रेलमपेल
वे पाठ पढ़ाते हैं हमको
‘सन्तोष करो, सन्तोष करो!’
उनके धन्‍धों की ख़ातिर
हम पेट काटकर टैक्स भरें
और नसीहत सुनते जायें –
‘त्याग करो, भई त्याग करो!’
मोटी-मोटी तोंदों को जो
ठूँस-ठूँसकर भरे हुए
हम भूखों को सीख सिखाते –
‘सपने देखो, धीर धरो!’
बेड़ा ग़र्क़ देश का करके
हमको शिक्षा देते हैं -
‘तेरे बस की बात नहीं
हम राज करें, तुम राम भजो!’
(इस कविता का मनबहकी लाल ने अपने निराले अन्दाल में अनुवाद किया है।)
कविता परिकल्पना प्रकाशन से प्रकाशित पुस्‍तक ‘कहे मनबहकी खरी-खरी’ से ली गयी है।

Monday, 14 November 2016

व्लादिमीर मायकोवस्की की कविता- तुम


maykovasky
तुम, जो व्याभिचार के कीचड़ में लगातार लोट रहे हो,
गरम गुसलखाने और आरामदायक शौचालय के मालिक!
तुम्हारी मजाल कि अपनी चुन्धियायी आँखों से पढ़ो
अखबार में छपी सेंट जोर्ज पदक दिये जाने जैसी खबर!
तुमको परवाह भी है, उन बेशुमार मामूली लोगों की
जिन्हें चिंता है कि वे कैसे पूरी करते रहे तुम्हारी हवश,
कि शायद अभी-अभी लेफ्टिनेंट पेत्रोव की दोनों टांगें
उड़ गयीं हैं बम के धमाके से?
कल्पना करो कि अगर वह, जिसे बलि देने के लिये लाया गया,
अपने खून से लतपथ टांगे लिये आये और अचानक देख ले,
कि वोदका और सोडा-वाटर गटकते अपने पियक्कड थोबड़े से
गुनगुना रहे हो तुम सेवेरियाती का कामुक गीत!
औरतों की देह, मुर्ग-मुसल्लम और मोटर गाड़ियों के पीछे पागल
तुम्हारे जैसे अय्याश लोगों के लिये, मैं अपनी जान दे दूँ?
इससे लाख दर्जे अच्छा है कि मास्को के भटियारखाने में जाकर
वहाँ रंडियों को शरबत पिलाने के काम में लग जाऊं.
(अनुवाद- दिगम्बर)

Wednesday, 2 November 2016

हिटलर के तम्बू में!

अब तक छिपे हुए थे उनके दाँत और नाख़ून ।
संस्कृति की भट्ठी में कच्चा गोश्त रहे थे भून ।
छाँट रहे थे अब तक बस वे बड़े-बड़े क़ानून ।
नहीं किसी को दिखता था दूधिया वस्‍त्र पर ख़ून ।
अब तक छिपे हुए थे उनके दाँत और नाख़ून ।
संस्कृति की भट्ठी में कच्चा गोश्त रहे थे भून ।

मायावी हैं, बड़े घाघ हैं, उन्हें न समझो मन्द ।
तक्षक ने सिखलाए उनको ‘सर्प नृत्य’ के छन्द ।
अजी, समझ लो उनका अपना नेता था जयचन्द ।
हिटलर के तम्बू में अब वे लगा रहे पैबन्द ।
मायावी हैं, बड़े घाघ हैं, उन्हें न समझो मन्द ।
(नागार्जुन)
नोट: यह आदमखोर यहाँ भी हो सकता है! हिटलर को हटाकर आरएसएस या मोदी लगाकर पढ़ें!

Tuesday, 1 November 2016

खैनी का गुणगान

खैनी खाओ, जहाँ मुड बने थूके जाओ,
क्या फर्क पड़ता है, किसी का मुंह हो या थोबड़ा;
खैनी खाए जाओ, दूसरों की परवाह क्यूँ,
मजे लो, सस्ता भी है, नशा भी है,
पैसा ना हो तो मान्ग लो, मिल ही जायेगा,
दो 70 चुटकी, 80 ताल, फिर देख लो खैनी का चाल!

कैंसर जबड़े का?
तब देखा जायेगा,
समाज ने दिया यह नशा 10 की उम्र में,
दोस्तों से, कारखाना में, गलियों में,
ऑफिस में, जेल में!
दिमाग सुन्न है, कारन विलुप्त है,
बस वर्तमान नजर आता है,
जो बर्बाद हो चूका है!

भगवन पर भरोसा करो, खैनी खाओ,
मदिरा और सुट्टा भी लगाओ,
गन्दगी और बेचारगी फैलाओ,
देश भक्ति का नारा लगाओ,
जय हिन्द, जय भारत,
जय जवान जय किसान!

जय हो खैनी!
सुबह हो या शाम,
शौच से पहले, शौच के बाद,
नाश्ता से पहले, खाना के बाद,
गप करते समय, चुप रहते समय,
सिनेमा घरों में, बस और ट्रेन में!
उंगल का इस्तेमाल करो,
घुसेड़ो मुंह में या निकालों मुंह से,
खिड़की से बाहर, बिस्तर के बगल में!
खैनी खाओ, बनानेवाले को मालामाल बनाओ,
खुद बीमार, जाहिल रहो!
सामाजिक विघटन में सहयोग दो!
खैनी जिंदाबाद, पर तुम भी क्या जिंदाबाद हो?
वैसे भी फर्क नहीं पड़ता इसका समाज पे!

खैनी के कई रूप!
गुटका से गुड़ाकू तक,
बीडी से सिगरेट तक,
असर है जबड़े से फेफड़े तक,
कैंसर की गिरफ्त तक!

हाय रे मानवता,
दुसरे के मुनाफे के लिए,
खुद को लुटा रहे हो!
खैनी जिंदाबाद,
बेबस इन्सान मुर्दाबाद,
दोनों नहीं हो सकते जिंदाबाद,

इसलिए खैनी जिंदाबाद!

कृष्ण कान्त