Thursday, 26 January 2017

सब मैनिफेस्टो में है: आदित्य कमल


बिजली ,पानी ,सड़क ,विकास - सब मैनिफेस्टो में है ।
खाद्य - सुरक्षा और आवास - सब मैनिफेस्टो में है ।
स्वास्थ्य और शिक्षा की आस - सब मैनिफेस्टो में है ।
पक्का शौचालय , संडास - सब मैनिफेस्टो में है ।
गाँव - नगर स्मार्ट , झकास - सब मैनिफेस्टो में है ।
लैप-टॉप का झाँसा - फाँस - सब मैनिफेस्टो मे है ।
फ्री की बिजली , फ्री का पास - सब मैनिफेस्टो में है ।
धोती , साड़ी , कंबल ख़ास - सब मैनिफेस्टो में है ।
नौकरियों का खुला आकाश - सब मैनिफेस्टो में है ।
'अच्छे दिन' की सुखद मिठास - सब मैनिफेस्टो में है ।
बुलेट - ट्रेन का नक़्शा पास - सब मैनिफेस्टो में है ।
वादों का पूरा रंग- रास - सब मैनोफेस्टो में है ।
हर मसले पर पैरा ख़ास - सब मैनिफेस्टो में है ।
वाह ! गज़ब का बुद्धि-विलास - सब मैनिफेस्टो में है ।
बंजर में हरियाई घास - सब मैनिफेस्टो में है ।
तीखा , मीठा और खटास - सब मैनिफेस्टो में है ।
जादू का गिल- गिल, फू - फास - सब मैनिफेस्टो में है ।
सम्मोहन का सा अहसास - सब मैनिफेस्टो में है ।
भिखमंगों सी हालत जनता की तुमने करके रख दी
उसपर ख़ैराती बकवास - सब मैनिफेस्टो में है ।
----- आदित्य कमल

तंत्र की सत्ता!

Naresh Saigal

तंत्र के सामने विवश गण
अजगर जितना विशाल तंत्र
कुंडली में गण को कसता तंत्र
अज़दहे को मात देता तंत्र
उफनता, बलबलाता तंत्र
खुशियों के पोस्टर दिखाता तंत्र
गरीब के निवाले छीनता तंत्र
आमजन को बेबस बनाता तंत्र
मोटे को और मुटवाता तंत्र
जसके लिए, जिसके नाम पर बना था
उस जन को झुठलाता तंत्र
मन्त्र से भी काबू में न आये
बेकाबू , सबसे ऊपर तंत्र
गण नीचे , ऊपर तंत्र
अपना लोकतंत्र, अपना गणतंत्र।

(इंसान को धर्म और जाति का ठेकेदार बनता तंत्र!)

Saturday, 14 January 2017

तू किस अधिकार से चरखे से फोटो जोड़ आया था

तू किस अधिकार से चरखे से फोटो जोड़ आया था !!
वो बैरिस्टर बड़े घर का सभी कुछ छोड़ आया था !!
कभी कुर्ता तेरा मैला, और अब है, सूट लाखों का !!
वो धोती बांध कर रूह-ए-वतन झकझोड़ आया था !!
गरीबों के लहू से हाथ रंगे हैं तेरे अब तक !!
अहिंसक रहके वो फौज-ए-फिरंगी मोड़ आया था !!
तेरी सियासत की रोटी सिकती है दंगे भड़कने पर
वो दंगे रोकने को रोटी पानी छोड़ आया था !!
तेरी बातों से सदियों से बने रिश्ते टूट रहे हैं
वोह गंगा और जमुना के किनारे जोड़ आया था

( Salauddin Meer )
( Sobhakar Sharma ki wall se )

Tuesday, 10 January 2017

सियासी अनपढ़: बेर्टोल्ट ब्रेक्त

'सियासी अनपढ़ सबसे बदतर अनपढ़ होता है, वह सियासी मामलों में ना हिस्सा लेता है, ना उनके बारे में कुछ बोलता-सुनता है। उसको मालूम नहीं कि जिंदगी का पूरा ख़र्च, सब्जी, मछली, आटे, जूतों, दवाई की कीमत, मकान भाड़ा, सब सियासी फैसलों से तय होता है। हद दर्जे का बेवकूफ सियासी अनपढ़ घमंड से छाती फुलाकर कहता है कि वह राजनीति से नफ़रत करता है। उस अहमक को मालूम ही नहीं कि उसकी राजनीतिक मूढ़ता की पैदावार हैं - कोई वेश्या, अनाथ बच्चा तथा चोट्टों में भी सबसे बदतर - भ्रष्ट और देशी-विदेशी कंपनियों के चाकर घटिया नेता।'
- Bertolt Brecht

Sunday, 8 January 2017

मेरी जंग उन लोगों के खिलाफ: Khalid Zama

मेरी जंग उन लोगों के खिलाफ है जिन्हे कटे हुए हाथों का अभिनंदन पसंद है
मेरी जंग उन लोगों के खिलाफ है जिनकी तिजोरियों मे मज़दूरों और किसानो के सपने गिरवी रकखे है
मैने ये क्रांति के दीप उन अंधेरों को चीरने के लिए जलाए है जहाँ देश का अंतिम आदमी अंधेरों टटोलता फिरता है रोशनी की एक किरण
मैं बंधुवा किसानो के हाथों से हल चीन कर बँदूक़ थमा देना चाहता हूँ जो पेट भर रोटियाँ खाने के एवज़ मे भर पेट लाठी खाते हैं
मैं ग़रीब मज़दूर किसानो की बेटियों को बूँद बूँद ज़हर देकर विषकन्या बना देना चाहता हूँ जो सफ़ेदपोश ज़मीदारों की अययाशियों की लार मे नहाई रहती हैं
मेरे अंदर की आग उन खद्दर धारियों की पोशाक़ो को जला देना चाहती है जो देश की सवा सौ करोड़ लोगों को लोकतंत्र के नाम पर सपने बेंच रही है
मैने ये गड्ढे उन लोगों को संगसार करने के लिए खोदे हैं जिनके दिमाग़ों मे दंगा कराने की खूनी साज़िशें रेंग रही हैं
मैं उन लोगों को शक्कर के शीरे मे डुबो कर छींटी और छींटों की खुराक बना देना चाहता हूँ जो इंसान को इंसान नहीं बनने देते
जब जनवरी ठंडी रात मे कोहरे मे लिपटे झोपडे मे कोई नाजायज़ बच्चा पैदा होता है तब मुझे लगता है कि और नॅक्सलाइट पैदा हो गया
और जब कभी मैं जेठ की तपती हुई दोपहर मे किसी आदिवासी बच्चे को जंगल की किसी घनी झाड़ी की छावो मे कुल्हाड़ी को पत्थर पर रगड़ते हुए देखता हूँ तो मुझे उसकी कुल्हाड़ी से उठती हुई लोह गंध मे एक परिवर्तन का अहसास होता है मुझे लगता है आज ये कुल्हाड़ी जंगल की किसी शाख पर गिरेगी और कल अपने नाजायज़ बाप की गर्दन के ऊपर!

मेरी टिपण्णी:

आग है इन पंक्तियों में! "मैं बंधुवा किसानो के हाथों से हल चीन कर बँदूक़ थमा देना चाहता हूँ जो पेट भर रोटियाँ खाने के एवज़ मे भर पेट लाठी खाते हैं"! यह आपने 1988 में लिखी है! केवल जवानी का जज्बा नहीं बल्कि जमीं से जुड़ने का और सताए हुए किसान और मजदुर के साथ का अनुभव और विद्रोह है! वर्ग संघर्ष और एकता फिर वर्ग संघर्ष और एकता तबतक जबतक इन अपराधी परजीवियों को परास्त नहीं करते, जबतक हम अपनी सत्ता नहीं कायम करते! विजय हमारी है! वर्ग संघर्श से वर्ग विहीन समाज बनायेंगे! सलाम कॉमरेड!