Tuesday, 31 May 2016

नेता और सुअर

संजीबा की कविता........." नेता और सुअर "
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मुझे इन नेताओं से अच्छे
सुअर के बच्चे लगे,
जो कम से कम रोजाना
मेरी गली तो घूम जाते हैं,
और अपने स्तर से
गंदगी खाकर
साफ तो कर जाते हैं,
लेकिन
वो कम्बख़्त आएगा
सिर्फ चुनाव के वक़्त
बस - वोट माँगने
और ये सफाई देने
कि - मैं सुअर से अच्छा हूँ
और कुछ नहीं....................
मेरी टिपण्णी: हम खुद सत्ता अपने हाथ में क्यूँ न ले लें?

Sunday, 29 May 2016

सर्वहारा क्रांति: जिंदाबाद!

क्रांति नहीं आसां
तो क्रांति विरोधी हो जाएँ?
मुक्ति नहीं आसां
तो गुलामी को गले लगा लें?
मालिक का विरोध नहीं कर सकते
तो घर में पत्नी की पिटाई कर दें?
हालात इतने बुरे नहीं दोस्तों,
बाहर तो निकले,
सैकड़ों साथी मिलेंगे!
विरोध का झंडा तो ऊपर करें,
हजारों साथ निकल पड़ेंगे!
पूंजी के खिलाफ एक कदम आगे बढ़ाएं,
लाखों हाथ साथ मिलेंगे!
क्रांति के लिए आगे बढ़ें,
करोडो सर्वहारा आपको आगोश में लेंगे!

सर्वहारा क्रांति जिंदाबाद!

क्रांति

क्रांति की गूंज लोक सभा, विधान सभा में नहीं,
गलियों में सुनाई देती है!
न्यायलय में नहीं, जहाँ मरते प्रजातंत्र की सिसकियाँ ही सुनाई देती हैं,
वहां जहाँ जिंदादिल मजदुर खटते हैं रात दिन, किसी के मुनाफे के लिए!
पुलिस चौकी में नहीं, जहाँ किसानो से लिखवाया जाता है पट्टा,
टाटा, अम्बानी को जमीं दिलवाने के लिए, मुनाफे के लिए,
खेतों, खलिहानों में जहाँ वह मरते हैं जिन्दा रहने के लिए,
और बैंकों और साहूकारों के कर्ज चुकाने के लिए!
7 सितारा होटल में नहीं, जहाँ विश्व भर के पूंजीपति मिलते हैं, मुनाफे में बटवारे के लिए,
बल्कि जेल में जहाँ, क्रन्तिकारी बंद हैं वर्षों से, बिना मामला खुले हुए!
क्रांति वहां नहीं पनपती है, जहाँ दिन रात षडयंत्र होता है,
धर्म, जाति, पूंजी के ठेकेदारों द्वारा,
बल्कि वहां जहाँ दिल में बसते है भगत सिंह,
जहाँ अन्याय और शोषण के खिलाफ पैदा होते हैं नए क्रांति वीर!
मजदुर एकता जिंदाबाद! क्रन्ति जिंदाबाद!

खौफ

भूख खौफ का नाश्ता करती है,
सन्नाटे का खौफ गलियों में गूंजता है,
खौफ धमकाती है-----
अगर तुमने प्यार किया, तो तुम्हे एड्स हो जाएगा
अगर तुमने सिगरेट पी, तो तुम्हे कैंसर हो जाएगा
अगर तुमने सांस ली, तो तुम प्रदूषण के शिकार होगे
अगर तुमने शराब पी, तो तुम हादसे का शिकार होगा
अगर तुमने खाया, तो तुम्हारा कोलेस्ट्राल बढ़ेगा,
अगर तुम बोलोगे, तो तुम नौकरी से निकाल दिए जाओगे
अगर तुम चलोगे, तो तुम लूट लिए जाओगे
अगर तुम सोचोगे, तो तुम्हे फिक्र होने लगेगी
अगर तुम शक करोगे, तो तुम पागल हो जाओगे
अगर तुम महसूस करोगे, तो तुम अकेले पड़ जाओगे
--खौफ की खिड़की!
 एदुआर्दो गालेआनो

Sunday, 8 May 2016

क्रांतिकारी मां!

जिन्होंने चुराये हमारे बच्चे
हमारी जमीन, हमारे जंगल
इस ग्रह का आनंदमय वर्तमान और भविष्य
और जो अपने अपने
राष्ट्र की संकुचित घेरेबंदी में
मां की बात करते हैं
जय मातृभूमि का थोथा शोर करते हैं
वे न हम छापामार मांओं को जानते हैं
न ही गोर्की की मां को
उनके इतिहास में नहीं है झलकारी बाई
नहीं हैं सिनगी दइ और कइली दइ
फूलो-झानो, माकी मुंडा और देवमनी भगत भी नहीं हैं
वे तो लक्ष्मी बाई को भी मरदाना कहते हैं
उसे स्त्री नहीं मानते
वे कौन हैं जो मांओं का बाजार सजाते हैं
भूला देना चाहते हैं रानी गाइदिनल्यू को
वे कौन हैं जो कोंख को त्रिशुलों पर उछालते हैं
और हजारों उन्मादी कंठों से चीखते हैं
यत्र नार्यस्तु पूजयंते रमंते तत्र देवता
जो नहीं जानते हैं मांओं को
वही बनाते हैं मां को ग्लोबल उत्पाद
वे भूल जाते हैं
कि मां का दूध सिर्फ दूध नहीं होता
रक्त होता है
जो उसकी छापामार देह से शुरू होकर
दौड़ता रहता है लड़ाकों की देह के अनंत विस्तार तक
जो बनाये रखता है
हर एक आत्मा को सजीव और सक्रिय!

Monday, 2 May 2016

ग़ज़ब की आफ़त आई है

न पानी है , न बिजली है ; न रोटी , ना दवाई है
कहर सी आफ़त है भाई , गज़ब की आफ़त आई है।
भरे गोदाम हैं सारे
मरें हम भूख के मारे
इधर पसरा हुआ सूखा
उधर चलते हैं फव्वारे
यहाँ के अस्सी फीसद आदमी के घर उदासी है
हमारे चेहरों पे फैली हुई बस बदहवासी है
महज कुछ फीसदी के चेहरे पे रौनक , ललाई है ।
न पानी है , न बिजली है .....
समूचे मुल्क का अब हाल
बेतरतीब दिखता है
ये कैसा रहनुमा है
मौत का कॉन्ट्रैक्ट लिखता है
करोड़ों और अरबों ऊपर-ऊपर ग़ुम हो जाता है
हमारी लाशों के मलबों का उनसे गहरा नाता है
खुली है लूट या फिर हाथ की शातिर सफाई है ।
न पानी है , न बिजली है.....
तरक्की ऐसी कि अब हर इलाका
उजड़ा - उजड़ा है
इधर से मानो छुट्टा साँढ़
सबकुछ चरते गुजरा है
पनामा है , हवाई है , दीवाला है , हवाला है
सब इनके बाप का है , कौन क्या अब कहनेवाला है
जहां था कांग्रेसी , आज बैठा भाजपाई है ।
न पानी है , न बिजली है.....
अगर बीमार पड़ जाओ
तो बस भगवान को गाओ
इलाज होने के पहले
बर्तन-बासन बेच कर आओ
हमारा आज संकट में है और भवितव्य अँधा है
यहाँ तो फूलता - फलता महज दौलत का धंधा है
कि सब लुट जाता है ,बचती सिरिफ सिसकी,रुलाई है ।
न पानी है , न बिजली है .....
यहाँ परदे में इज़्ज़त
लूट ली जाती है घर घुस के
यहाँ बेटी - बहन से
कहा जाता है चलो झुक के
हमारे मुल्क की ताज़ा हवाएँ सूलियों पर हैं
यहाँ पंचायतों से दिए जाते फतवे बर्बर हैं
यहाँ हर बात पर रस्मों - रिवाज़ों की दुहाई है
न पानी है , न बिजली है .....
यहाँ दंगों से अब तो
हर सियासी खेल सजता है
गज़ब है ढोंग , हत्यारा ही
जनता-नाम भजता है
हरेक तक़रीर में नफ़रत भरी है ख़ूनी स्याही से
डरा - सहमा हुआ है आज भाई अपने भाई से
अरे , शासन है या कि कोई जालिम आतताई है ।
न पानी है , न बिजली है .....
यहां सबकुछ है , पूरा है
मगर है यार कब्ज़े में
जमीं उनकी , हरेक औजार
सब हथियार कब्ज़े में
उन्हीं का माल , सब असबाब , हर बाज़ार कब्ज़े में
इधर हम कसमसाते , चीखते बेजार कब्ज़े में
उठो , कब्ज़ा करें अब हम ; ये कब्ज़े की लड़ाई है
न पानी है , न बिजली है , न रोटी ,ना दवाई है
कहर सी आफ़त है भाई , गज़ब की आफ़त आई है।
----- आदित्य कमल