मांगो नहीं लड़ो
Tuesday, 15 December 2020
मांगो नहीं लड़ो
Wednesday, 2 December 2020
क्या था क्या हो गया
क्या था क्या हो गया:
Sunday, 15 November 2020
जिंदगी: क्या बकवास है!
जिंदगी: क्या बकवास है!
Sunday, 1 November 2020
अकेलापन
अकेलापन
Thursday, 29 October 2020
गर मिल जाये जिंदगी दुबारा
गर मिल जाये जिंदगी दुबारा
हमारे हत्यारे
हमारे हत्यारे
क्यों करें इज्जत औरतों की
क्यों करें इज्जत औरतों की
Sunday, 18 October 2020
ये क्या हो गया?
ये क्या हो गया?
कहां आ गये हम?
कहां आ गये हम?
Sunday, 11 October 2020
हमारे घर में आग लगाया है
हमारे घर में आग लगाया है
हमारे घर में आग लगवाया है
महल वालों के गुंडों ने लगवाया है
लग्गी लगा के दूर से ही जलवाया है
खुद आग से बच जाओगे ऐसा सोचा है?
झोपड़पट्टी को सभ्यता से दूर कर रहे हो
मजदूरों का काम खत्म होते लतिया रहे हो
बेरोजगारों की अनगिनत फौज तो बढ़ा रहे हो
अनजाने ही सही, पर अपनी मौत को बुला रहे हो।
झोपडपट्टियों की कतारें बिछा देंगे
झोपड़ महल के फासले खत्म कर देंगे
हवा का रुख बदल लपटें महलों तक पहूंचा देंगे
हमारा जो भी हो, तुम्हारा भी नामों निशान मिटा देंगे।
बच्चे भगवान के रूप?
बच्चे भगवान के रूप?
बच्चे बच्चे होते हैं
अच्छे अच्छे से होते हैं
कुत्तों के या आदमी के हैं।
स्वस्थ्य हों, पेट भरा हो
तो खेलते और हंसते रहते हैं
प्यारे प्यारे से, लुभावने लगते हैं।
इनकी छोटी सी जरूरत है
भूख और बिमारी से मुक्ती की है
पर पूंजीवाद है, जो इनकी खान है।
भगवान, अल्लाह, गॉड
सारे पूंजीवाद के लिए ही तो हैं
और बिचारे गरीब बच्चों के दुश्मन हैं।
सैनिक
सैनिक
सैन्य प्रशिक्षण, सैन्य अनुशासन है
सैन्य जीवन एक कठोर कवायद है
कदमताल मरने मारने को तैयार है
क्या सिर्फ देश, समाज के लिए है?
गरीब किसान मजदूर का बच्चा
जीवन को तलाशता हुआ कच्चा
पहुंचा था वो सैनिक भर्ती केंद्र में
निकला रंगरुट वो सैनिक वर्दी में
भटक रहा था रोजी रोटी के लिए
तनख्वाह, जीवन, पेंशन के लिए
कमाने आया था परिवार के लिए
मर गया बिचारा "वतन" के लिए।
लड़ें वह और मुनाफा कमायें दूजे
सैनिक के नाम पर वोट मांगे तीजे
सैनिक स्मारक शिलान्यास करें वो
सैनिक मांगों पर ठेंगा दिखायें वो।
Wednesday, 7 October 2020
सैनिक
सैनिक
कुंठित मन
कुंठित मन
जीवित या मृत, हलचल नहीं
जीवित या मृत, हलचल नहीं
जन प्रतिनिधि
Saturday, 26 September 2020
अपने लिए तो लड़ता ही रहा हूँ
अपने लिए तो लड़ता ही रहा हूँ
Thursday, 24 September 2020
गमों का पहाड़? : यहीं पे लड़ना है!!
गमों का पहाड़?
Saturday, 19 September 2020
सड़क पे जींदगी
सड़क पे जींदगी
एक सड़क आ रही थी, जा रही थी
पता नहीं कहाँ से, पर गतिमान थी।
घोड़ा बकरी, बैल गाड़ी चल रहा था
धूल से, दिन में शाम सा नजारा था।
चौराहे पर लाल बत्ती गुल था
सुबह शाम में ढल चुका था।
रेलमपेल बेकाबू हो चुका था
सड़क बहुत तेज हो चला था।
अचानक हुआ, ब्रेक की आवाज
धक्का, चिखने, दर्द की आवाज।
फिर शांति, पुलिस गाड़ी की आवाज
और एम्बुलेंस के सायरन की आवाज।
रोज की कहानी, पुरानी है
आम जनता, आम मौत है।
सड़क आ रही है, जा रही है
जनता आ रही है, मर रही है।
खत्म होगा मालिक पे एतबार?
खत्म होगा मालिक पे एतबार?
बहुत हुआ बराबरी का नाटक
कानून के बराबरी का नाटक
धर्मनिरपेक्ष जाति विहीन ढोंग
और प्रजातंत्र, न्याय का ढोंग।
अनपच हो गया है मझे जुमलों से
खाली पेट में उठते सुखे मरोड़ों से
झूठ देशी और विदेशी बकवासों से
मक्कारी, बलात्कार और जुल्मों से।
खत्म हो रहा मेरा सब सपना
बच्चों का खेलना और पढ़ना
बढ़ा बुढ़ों का दर्द से कराहना
औरतों की इज्जत से खेलना।
छलकेगा तेरे सब्र का घड़ा कब
टूटेगा भ्रम का मकड़जाल कब
खत्म होगी अकेलेपन की दीवार
और हत्यारे मालिकों पे ऐतबार?
उठे हैं करोड़ों क्रांतिकारी
उठे हैं करोड़ों क्रांतिकारी
अच्छा हिन्दू या सिख हो सकता है
मुसलमान या ईसाई हो सकता है,
जैन, बुद्ध और बहाई हो सकता है
पर खालिस इंसान बनना कठिन है।
एक अच्छा इंसान जाति धर्म से परे है
21 वीं शताब्दी है विज्ञान और तर्क है,
उसे नास्तिक भगत सिंह बनना होगा
समाजवाद, क्रांति भी सिखना होगा।
नया जमाना, नया समय नयी सोच है
युवा पीढ़ी नया जोश, उफान उठा है,
मजदूर, किसानों और क्षात्रों में रोष है
उठे हैं करोड़ों क्रांतिकारी दावानल है।
अधेड़ जोड़े
एक जोड़े से मिला वे दोनों अधेड़ हैं
बच्चे सेटल्ड और खुद चिंता मुक्त हैं
कभी कभी बाहर भी खाना खाते हैं
हजार बारह सौ खर्च कर ही देते हैं।
बाजार भी जाते हैं, शौपिंग कर लेते हैं
कभी-कभी गहने तक भी खरीद लेते हैं
देश और आर्थिक मंदी की चिंता नहीं है
दरिया दिल, मस्त हैं, जीवन चल रहा है।
पर कामगारों, ठेलेवालौं को न भाव देते
भिखारियों को समाज पर बोझ समझते
खुद भगवान, अल्लाह, गौड के खास हैं
बाकि को देखते जैसे समाज पे बोझ हैं।
भिन्न-भिन्न रुप
भिन्न-भिन्न रुप
कोई दाढ़ीवाला है, तो कोई तिलकधारी
कोई सुट बूट वाला, तो कोई लंगोटधारी
कोई टोपी वाला है, तो कोई खड़ाउधारी।
पर भगवान, अल्लाह, गौड सबका एक
पैसा वाला मालिक भी तो सबका है एक
बाहर से अनेक, पर अंदर से सब हैं एक।
हम सब बंदर, मदारी हो गये हैं सब एक
हिंदू मुसलमान, सिख इसाई, बने अनेक
लूट रहे हैं, पर खुश हैं, लूट रहे हैं अनेक।
क्या हो सकते हैं हम सब फिर से एक
दुश्मनों को कर दें नेस्तानाबुद, परस्त
हो हमारा आज और कल हमारे हाथ।
Sunday, 9 August 2020
मेरे तुकबन्दी का कमाल देखो
मेरे तुकबन्दी का कमाल देखो,
नहीं, तो मेरी बकवास ही झेलो।
पूंजीवाद फासीवाद में बदल गया
तर्क-विज्ञान को धर्म निगल गया।
नौकरी को सरकार ही खा गयी
मछली को मछली निगल गयी।
कॉंग्रेस को भाजपा चबा गया
और सारे एमएलए खरीद लिया।
इधर आप को अरविंद केजरीवाल
भाजपा को मोदी शाह पचा गया।
जनता को जनता ही खा गयी
आधी इधर आधी उधर हो गयी।
वामपंथी घोर दक्षिणपंथी हो गया
भारत हिटलर का जर्मनी बन गया।