Tuesday, 15 December 2020

मांगो नहीं लड़ो

 मांगो नहीं लड़ो

आरक्षण मांगते हो, बेरोजगारी भत्ता मांगते हो
रोजगार है कहां, जिसके लिए भीख मांगते हो
मांगो तो खुद के लिए नहीं, सबके लिए मांगो
दिल खोलकर, सौ प्रतिशत रोजगार मांगो।
अब हक मांगना भीख मांगने से बदतर है
समय का तकाजा है, लड़ के लेना सिख
जिंदगी जीना है तो संघर्ष करना सीख
जिने से पहले शहादत देना सिख।
मांगने और मांगने में बड़ा अंतर है
अकेला मांगना गिड़गिड़ाना है
मिल कर मांगना अधिकार है
हक़ छिनना पड़ता है।

Wednesday, 2 December 2020

क्या था क्या हो गया

 क्या था क्या हो गया:

मांगा तो बस रोजगार ही था
पाकिस्तानी, देशद्रोही घोषित कर दिया
बच्चों के लिए शिक्षा और परिवार के लिए दवा
जेल के अंदर डाल दिया और यूएपीए ठोक दिया।
जो वादा किया था, जुमला निकला
खाना, पहनावा पर अधिकार ना रहा
जो कल हमारा था, वो सरकार का हो गया
जो सरकारी था, वो आज अम्बानी का हो गया।
क्या बोलूँ, क्या पढ़ूं,
किससे प्यार, शादी करूं
धर्म पूंजी के दल्ले तय करेंगे
और न्यायाधीश मोहर लगायेंगे।

Sunday, 15 November 2020

जिंदगी: क्या बकवास है!

 जिंदगी: क्या बकवास है!


लालू आया लालू गया
नीतिश आया नीतिश ना गया
आयाराम आया और आयाराम गया
तेली कल्लू, भुजिया न ही आया न ही गया।

कोई और ना ही आया और ना गया
जनता का न आना हुआ, न जाना हुआ
जहाँ था वहीं पे ठिठुरता और ठहरा सा हुआ
लुटता, शर्माता, और ठगा सा महसूसता हुआ।

प्रजातंत्र और वतन को बचाता हुआ
खुद को सम्विधान की बली पर चढ़ाता हुआ
अगले जन्म में राजकुमार की कल्पना देखता हुआ
इस जन्म, सम्मान और मुर्खता की सुली पर चढ़ गया।

Sunday, 1 November 2020

अकेलापन

                                     अकेलापन

पहले डर लगता था अकेले रहने में
अब आदत सी हो गयी है अकेले रहने में
दोस्तों की भरमार, रैलमपेल थी, हर माहौल में
पर लगता है डर और घुटता है दम अब हर भीड़ में।
यह भीड़ नहीं हैं अजनबियों का
अनायास दर्शकों का, तमाशबीनों का
मगर आतंकवादियों का, खुद अपनों का
सुलझे हुए गद्दारों का, हत्यारौं, मक्कारों का।
भीड़ है कुछ खास मकसद के साथ
सरकार है इस "खास" मकसद के साथ
सब पैसे और खून के लिए पागल हो रहे हैं
लूट, दंगे, बलात्कार इनके हथियार बन गये हैं।
क्या भीड़ का मुकाबला भीड़ से
क्या डंडे का जवाब हम भी दें डंडे से
या फिर फासीवाद का मुकाबला क्रांति से
पूंजीवाद को नेस्तानाबुद करें समाजवाद से?

Thursday, 29 October 2020

गर मिल जाये जिंदगी दुबारा

 गर मिल जाये जिंदगी दुबारा

याद है जहां तक वहीं से जीना चाहता हूं
बड़ी नहीं, छोटी मोटी गलतियाँ सुधार सकूं
बड़ा हो गया खास अनुभवी अब तो हो गया हूं
नयी जिंदगी, नये तरीके, नयेपन से अब जी सकूं।
मारा था छोटे भाई को, मारूं ना दुबारा
टिफिन बाद ही भागा जाता था स्कूल से
अब तो जाऊं ही ना स्कूल में कभी शुरू ही से
पास ही ना फटकूं उस सहपाठी के, जिसने था मारा।
जवानी में चक्कर लगाये थे, बनने को नौकर
भटका सारा जहां, इंटरव्यू दिये, हूये सारे बेकार
शादी की उनका सुंदर मुस्कान और मुखड़ा देख कर
इस बार ना ही शादी करूं ना ही बनुं किसी का चाकर।
भले ही भगत सिंह ना कभी बन पाऊं
पर केवल क्रांति का रास्ता ही मैं अपनाउं
पर सब को पता है, ख्याली पुलाव है यह सब
यहीं से आगे बढ़ानी है, अपनी जिंदगानी अब।

हमारे हत्यारे

 हमारे हत्यारे

हमारे हत्यारे ढूंढ रहे थे हमें
जा पहुंचे उन्हीं के मयखाने में
नशे में धूत्त थे, सुपारी के पैसों में
पता न था पहुंच गये मौत के गोद में।
बांछें खिल गयीं, जब पहचाना हमें
हलाल से पहले, भर ली आगोश में हमें
बोला बहुत लम्बी उमर है, मुबारक दी हमें,
बताया बस अभी अभी तो याद कर रहे थे तुम्हें।
एक जाम भी सरकाया हमारे पीने के लिए
खुद लगाया जाम होठों से, ली घूंट मजे के लिए
और फिर सिखाई मुझे तरजीह, जाम पीने के लिए
बोला, जाम उठा, बोलो "तुम्हारी लम्बी उम्र के लिए"।
पता चला, कातिल भी वही, मुंसिफ भी वही
भाग्य भरोसे छोड़, लगा ली मैंने भी दो चार वहीं
नशा टूटा, नींद टूटी जैसे ही विदेसी मुर्गे ने बांग दिया
क्या फर्क पड़ता है, जिंदगी बची और मुफ्त में देसी पिया।

क्यों करें इज्जत औरतों की

 क्यों करें इज्जत औरतों की

नहीं पूजा करता औरतों के लिए
ना ही लड़ता हूं उनके नाम के लिए
मजदूर हैं गर वो, बराबर हों पुरूषों के
हां लड़ता हूं, शोषण के खिलाफ उनके।
औरत एक इंसान है, मजदूर है
पर न देवी है, न ही कोई शक्ति है
न तो वो दासी है, न ही वो मजबूर है
न ही पुरूषों के लिए सेक्स खिलौना है।
निजी सम्पत्ति ने घर में बंद किया
दासता और सामंती ने रखैल बनाया
पूंजी ने माल बना उसे बाजार में ला दिया
खरीद बिक्री का टैग लगा माल बना दिया।
बाजारू नहीं, इंसान बनने दो
देवी नहीं, पर मुंह छुपाना भी नहीं
औरतों की इज्जत घूंघट से हर्गीज नहीं
बराबरी और काम का अधिकार दो जीने दो।

Sunday, 18 October 2020

ये क्या हो गया?

 ये क्या हो गया?

मूर्खों की चल पड़ी, शिक्षक बन गये हैं
जिंहे रास्ते दिखाते थे, राह दिखा रहे हैं
झाड़ फूंक करने वाले डाक्टर बन गये हैं।
पहले गुंडों से मदद लेते जाते थे
अब गुंडे मालिक, साधू चाकर हैं
सारे रिश्ते उल्टे पुल्टे हो गये हैं।
गणित विज्ञान मजाक बन गया है
धर्म अज्ञानता विज्ञान बन गया है
औरत गोरू, जानवर भगवान बन गया है।
न्यायालय दलाली करता है
दलाल ही अब न्याय करता है
मीडिया घटिया जोकर बन गया है।

कहां आ गये हम?

                                                     कहां आ गये हम?

होमोसेपियंस से मानव तक के सफर में
श्रम आधार था, चार से दो पैर पे खड़े होने में
अफ्रीका से अमरीका, युरोप, एशिया तक आने में
पर सिसक रहा है खुद के बनाए पूंजी के निर्मम पैरों में।
क्या अंत है श्रम के सफर की
2-3 लाख वर्षों के भागम भाग की
अनंत समय की दासता, पूंजी की गुलामी में
या बाकि है श्रम और पूंजी के लड़ाई की कहानी में?
श्रम की लड़ाई, यानी श्रमिक की
पूंजी की लड़ाई, यानी पूंजीपति की
अंतिम लड़ाई बाकी है, कहानी अधुरा है
पूंजी का दफन, श्रम के जीत का जश्न बाकी है।

Sunday, 11 October 2020

हमारे घर में आग लगाया है

                                             हमारे घर में आग लगाया है

हमारे घर में आग लगवाया है
महल वालों के गुंडों ने लगवाया है
लग्गी लगा के दूर से ही जलवाया है
खुद आग से बच जाओगे ऐसा सोचा है?

झोपड़पट्टी को सभ्यता से दूर कर रहे हो
मजदूरों का काम खत्म होते लतिया रहे हो
बेरोजगारों की अनगिनत फौज तो बढ़ा रहे हो
अनजाने ही सही, पर अपनी मौत को बुला रहे हो।

झोपडपट्टियों की कतारें बिछा देंगे
झोपड़ महल के फासले खत्म कर देंगे
हवा का रुख बदल लपटें महलों तक पहूंचा देंगे
हमारा जो भी हो, तुम्हारा भी नामों निशान मिटा देंगे।

बच्चे भगवान के रूप?

                                                बच्चे भगवान के रूप?

बच्चे बच्चे होते हैं
अच्छे अच्छे से होते हैं
कुत्तों के या आदमी के हैं।

स्वस्थ्य हों, पेट भरा हो
तो खेलते और हंसते रहते हैं
प्यारे प्यारे से, लुभावने लगते हैं।

इनकी छोटी सी जरूरत है
भूख और बिमारी से मुक्ती की है
पर पूंजीवाद है, जो इनकी खान है।

भगवान, अल्लाह, गॉड
सारे पूंजीवाद के लिए ही तो हैं
और बिचारे गरीब बच्चों के दुश्मन हैं।

सैनिक

 सैनिक

सैन्य प्रशिक्षण, सैन्य अनुशासन है
सैन्य जीवन एक कठोर कवायद है
कदमताल मरने मारने को तैयार है
क्या सिर्फ देश, समाज के लिए है?

गरीब किसान मजदूर का बच्चा
जीवन को तलाशता हुआ कच्चा
पहुंचा था वो सैनिक भर्ती केंद्र में
निकला रंगरुट वो सैनिक वर्दी में

भटक रहा था रोजी रोटी के लिए
तनख्वाह, जीवन, पेंशन के लिए
कमाने आया था परिवार के लिए
मर गया बिचारा "वतन" के लिए।

लड़ें वह और मुनाफा कमायें दूजे
सैनिक के नाम पर वोट मांगे तीजे
सैनिक स्मारक शिलान्यास करें वो
सैनिक मांगों पर ठेंगा दिखायें वो।

Wednesday, 7 October 2020

सैनिक

 सैनिक

सैन्य प्रशिक्षण, सैन्य अनुशासन है
सैन्य जीवन एक कठोर कवायद है
कदमताल है मरने मारने को तैयार है
पर क्या देश और समाज के लिए है?
गरीब किसान मजदूर का बच्चा
जीवन को तलाशता हुआ कच्चा
पहुंचा गया था सैनिक भर्ती केंद्र में
निकला रंगरुट वो सैनिक वर्दी में
भटक रहा था रोजी रोटी के लिए
तनख्वाह और पेंशन के लिए
जीने आया था परिवार के लिए
मर जाता है बिचारा "वतन" के लिए।
लड़ें वह, मुनाफा कमायें वो
सैनिकों के नाम पर वोट लें वो
सैनिक स्मारक शिलान्यास करें वो
सैनिकों के मांग पे ठेंगा दिखायें वो।

कुंठित मन

 कुंठित मन

70% के साथ स्नातक डिग्री ली थी
चोरी नहीं, मिहनत से पढ़ाई की थी
रट्टा भी मारा था और समझा भी था
आज नहीं, वह कल का जीवन था।
धर्म पर युद्ध है, जातीय संस्कृति है
गॉड को बचाना है, देश पे लड़ना है
इंसान का क्या, खाना तक नहीं है
मुर्त को मारो, मुर्ती पीछे भागना है।
अजीब कश्मकश है, घोर अंधेर है
अज्ञान, व अंधविश्वास का जोर है
विज्ञान पढ़ा किसी काम का नहीं है
जो पढ़ा नहीं कभी सर पे सवार है।
फासीवादी सत्ता, नंगा नाच रहा है
भारी बेगारी कुंठित मन लाचारी है
मजदूर, किसान, युवा बदहवास है
प्रजातंत्र पस्त है फासीवाद मस्त है।

जीवित या मृत, हलचल नहीं

 जीवित या मृत, हलचल नहीं

खबरें सब मालूम है उसे,
वाकिफ है वह हर खबर से!
जनता की उठती हर कराहों से
बच्चियों पर बढ़ते बलात्कारों से।
खत्म हो रही जिंदगानियों से
चित्कारती कराहती महिलाओं से।
चेहरा विहीन पुलिस की दरिंदगियों से
लिजलिजे प्रशासन के हर क्रूर अट्ठाहस से।
सब सामान्य है उसके लिए
और उसके चापलूसों के लिए।
वह बड़ी बातें करता है परलोक की
पर लूट-खसोटता रहा है इस लोक की।
जनता नादान नहीं, ना ही थी कभी
फिर क्यों मुर्दा घर सी है शांति अभी।
तुम जीवित हो या मृत, हलचल भी नहीं
किसी भी जाने अनजाने लाश से कम नहीं!

जन प्रतिनिधि

जन प्रतिनिधि
हुज़ूर के बदले बदले से मिजाज लग रहे हैं
सत्ता पक्ष से "गुफ्तगू" की खबरें आ रही हैं।
सरकारी अधिकारी, जनता के चाकर आप
पर सत्ता दल की वफादारी कर रहे हैं आप।
चुनाव लड़ना है? अब जनता को भरमाओगे
जातिवाद धर्म, पाखंड और शंख बजाओगे।
चुनाव जीतोगे, जन प्रतिनिधि बन जाओगे
और जन धन दोनों के मालिक बन जाओगे।
प्रजातंत्र है, हक है तुम्हारा
पैसे कमाना, चुनाव लड़ना
जनता को आपस में लड़वाना
और जनतंत्र का तमाशा बनाना।

Saturday, 26 September 2020

अपने लिए तो लड़ता ही रहा हूँ

 अपने लिए तो लड़ता ही रहा हूँ

अपने लिए ही तो लड़ता रहा हूं
बचपन से अधेड़ावस्था, खुद के लिए
कभी दूध के लिए, तो कभी दारू के लिए
रोजगार के लिए, तो कभी नाम कमाने के लिए।
दायरा बढ़ा भी तो परिवार के लिए
कभी दोस्तों और खुद के मस्ती के लिए
चौराहे पर भीख मांगते बच्चों, छक्कों के लिए
पर हमेशा, गम हो या खुशी, सिर्फ मालिकों के लिए।
चमचागिरी तो भरी थी मेरे खून में
पहली कक्षा से अच्छी नौकरी पाने में
महिने के पहले दिन से पगार मिलने तक में
जरूरत पड़े तो दोस्तों के साथ घात तक करने में।
दास बन कर रह गया था पूंजी के गुलामी में
बचपन से जवानी तक के शिक्षा और अपने में
बुढ़ापे में आंखें तो खुली, पर खुली क्या वास्तव में
क्या रास्ता बदली जा सकती है, अब इस बचे जवानी में?

Thursday, 24 September 2020

गमों का पहाड़? : यहीं पे लड़ना है!!

 गमों का पहाड़?

गमों का पहाड़ तो नहीं टूटा है
पर अंतहीन टीले हैं कतारों में।
जब भी सम्भालता हूं दो चार को
दर्जनों खड़े हो जाते हैं कतार में।
सुझाव एक चतुर ज्योतिष का
ग्रहों को सीधा करवा लेने का।
पुछा सितारों का क्या बहुतेरे हैं
जो हर घर में दो चार सौ बैठे हैं?
ध्यानमग्न बाबा ने समझाया
बाहर देखना बंद कर, माया है।
अपने ही अंतर्मन का दर्शन कर
समस्या का वहीं पे समाधान है।
पर सरकार के डंडे, पेट का भूख
अंदर बाहर दोनों ही याद दिलाते हैं।
पहाड़, टीले, भूख, बिमारी असली हैं
इसी लोक में रहना है, यहीं पे लड़ना है।

Saturday, 19 September 2020

सड़क पे जींदगी

 सड़क पे जींदगी

एक सड़क आ रही थी, जा रही थी
पता नहीं कहाँ से, पर गतिमान थी।
घोड़ा बकरी, बैल गाड़ी चल रहा था
धूल से, दिन में शाम सा नजारा था।

चौराहे पर लाल बत्ती गुल था
सुबह शाम में ढल चुका था।
रेलमपेल बेकाबू हो चुका था
सड़क बहुत तेज हो चला था।

अचानक हुआ, ब्रेक की आवाज
धक्का, चिखने, दर्द की आवाज।
फिर शांति, पुलिस गाड़ी की आवाज
और एम्बुलेंस के सायरन की आवाज।

रोज की कहानी, पुरानी है
आम जनता, आम मौत है।
सड़क आ रही है, जा रही है
जनता आ रही है, मर रही है।

खत्म होगा मालिक पे एतबार?

 खत्म होगा मालिक पे एतबार?

बहुत हुआ बराबरी का नाटक
कानून के बराबरी का नाटक
धर्मनिरपेक्ष जाति विहीन ढोंग
और प्रजातंत्र, न्याय का ढोंग।

अनपच हो गया है मझे  जुमलों से
खाली पेट में उठते सुखे मरोड़ों से
झूठ देशी और विदेशी बकवासों से
मक्कारी, बलात्कार और जुल्मों से।

खत्म हो रहा मेरा सब सपना
बच्चों का खेलना और  पढ़ना
बढ़ा बुढ़ों का दर्द से कराहना
औरतों की इज्जत से खेलना।

छलकेगा तेरे सब्र का घड़ा कब
टूटेगा भ्रम का मकड़जाल कब
खत्म होगी अकेलेपन की दीवार
और हत्यारे मालिकों पे ऐतबार?

उठे हैं करोड़ों क्रांतिकारी

उठे हैं करोड़ों क्रांतिकारी

अच्छा हिन्दू या सिख हो सकता है
मुसलमान या ईसाई  हो सकता है,
जैन, बुद्ध और बहाई हो सकता है
पर खालिस इंसान बनना कठिन है।

एक अच्छा इंसान जाति धर्म से परे है
21 वीं शताब्दी है विज्ञान और तर्क है,
उसे नास्तिक भगत सिंह  बनना होगा
समाजवाद, क्रांति भी  सिखना होगा।

नया जमाना, नया समय नयी सोच है
युवा पीढ़ी नया जोश, उफान उठा है,
मजदूर, किसानों और क्षात्रों में रोष है
उठे हैं करोड़ों क्रांतिकारी दावानल है।

अधेड़ जोड़े


 एक जोड़े से मिला वे दोनों अधेड़ हैं

बच्चे सेटल्ड और खुद चिंता मुक्त हैं
कभी कभी बाहर  भी खाना खाते हैं
हजार बारह सौ खर्च कर ही देते हैं।

बाजार भी जाते हैं,  शौपिंग कर  लेते हैं
कभी-कभी गहने तक भी खरीद लेते हैं
देश और आर्थिक मंदी की चिंता नहीं है
दरिया दिल, मस्त हैं, जीवन चल रहा है।

पर कामगारों, ठेलेवालौं को न भाव देते
भिखारियों को समाज पर बोझ समझते
खुद भगवान, अल्लाह, गौड के खास हैं
बाकि को देखते जैसे समाज पे बोझ हैं।

भिन्न-भिन्न रुप

भिन्न-भिन्न रुप

कोई दाढ़ीवाला है, तो कोई तिलकधारी

कोई सुट बूट वाला, तो कोई लंगोटधारी
कोई टोपी वाला है, तो कोई खड़ाउधारी।

पर भगवान, अल्लाह, गौड सबका एक
पैसा वाला मालिक भी तो सबका है एक
बाहर से अनेक, पर अंदर से सब हैं एक।

हम सब बंदर, मदारी हो गये हैं सब एक
हिंदू मुसलमान, सिख इसाई, बने अनेक
लूट रहे हैं, पर खुश हैं, लूट रहे हैं अनेक।

क्या हो सकते हैं हम सब फिर से एक
दुश्मनों को कर दें नेस्तानाबुद, परस्त
हो हमारा आज और कल हमारे हाथ।

Sunday, 9 August 2020

मेरे तुकबन्दी का कमाल देखो

 मेरे तुकबन्दी का कमाल देखो,

नहीं, तो मेरी बकवास ही झेलो।


पूंजीवाद फासीवाद में बदल गया
तर्क-विज्ञान को धर्म निगल गया।
नौकरी को सरकार ही खा गयी
मछली को मछली निगल गयी।

कॉंग्रेस को भाजपा चबा गया
और सारे एमएलए खरीद लिया।
इधर आप को अरविंद केजरीवाल
भाजपा को मोदी शाह पचा गया।

जनता को जनता ही खा गयी
आधी इधर आधी उधर हो गयी।
वामपंथी घोर दक्षिणपंथी हो गया
भारत हिटलर का जर्मनी बन गया।

Thursday, 16 July 2020

हम और भगवान

हम और भगवान

हमारे पूर्वजों ने तुम्हें बनाया
और तू हमारा मालिक बन गया,
तेरे ठेकेदार चूस रहे खून हमारा
तेरी ही रक्षा के नाम पर!!

कितने कमजोर थे पूर्वज हमारे
अज्ञान, अंधविश्वासी, बेघर, बेचारे
पर हम तो उनसे भी गये गुजरे
आपस में ही मर कट जल मरे।

क्या कोई रास्ता नहीं है,
मुक्ति का, जिंदगी पाने का
जिने का, इंसान बनने का,
सिवाय इंकलाब का?

Monday, 6 July 2020

इंकलाब हो हमारा नारा

झूठों और गद्दारों के बीच,
शोषकों, मक्कारों के बीच,
सिसकता मजदूर, किसान,
बच्चे, महिला, बुढ़े, जवान।

जनता को किया लहू-लुहान,
अट्ठाहस कर रहे सारे धनवान,
बहू बेटियों तक को ये छोड़ें न,
पुलिस, प्रशासन सब हैं हैवान।

हजारों, लाखों और करोड़ों हैं जन,
बहुमत में, पर एक दूजे से अनजान,
धर्म, जाति, रंगभेद, देश "उनकी" देन,
पकड़ लिया हमने जैसे अपनी ही "देन"।

क्या छुटकारा मिलेगा, ओए भगवान,
या यह भी है एक काल्पनिक पकवान?
रे साथी, मरना भी तो है एक जरूरी काम,
मरने से पहले क्यों न अमर करें अपना नाम?

सब एक ही नांव में, क्यों ना मिलें हम?
एक सी हालात, फिर भी बिखरे हैं हम,
धूर्त है दुश्मन, क्यों बुद्धू रह गए हम?
एक बार तो आजमा लें, अपना दम।

इंकलाब हो हमारा नारा,
और दूजा नहीं कोई चारा,
उठो, आगे बढ़ो, देना है बलिदान,
इस मुक्ति का रास्ता नहीं आसान।

Sunday, 7 June 2020

सदियों से धर्म भी यही चाहता है कि तुम डरो...

सदियों से धर्म भी यही चाहता है कि तुम डरो...

सदियों से धर्म भी यही चाहता है कि तुम डरो...
शनि से डरो, काली से डरो
राहू से डरो, केतू से डरो,
यमराज से डरो, तथाकथित धर्मराज से डरो,
भूत से डरो, प्रेत से डरो,
चुड़ैल से डरो, देव से डरो,
रक्षक से डरो, अभिनेता भक्षक से डरो,
पंडो से डरो, मठो से डरो,
देवी देवताओं से डरो, भगवान से भी डरो ।

आखिर वे ऐसा क्यों चाहते हैं ?
तो सुनिए आपके डर में ही उनका अस्तित्व है...
जिस दिन आप निडर होकर खड़े हो गये
उस सबका अस्तित्व खतरे में पड़ जायेगा...
(Not by me)