" समाज की तमाम कुरूपताओं को ''कुरूप'' क्रान्तियों से ही दूर किया जा सकता है और ''कुरूप'' कविताएँ ही ऐसे समय में ज़रूरी औजारों या रोजमर्रे की जिन्दगी में बरते जाने वाले सामानों की तरह काम आयेंगी।"
बहुत सही! "कुरूप" कवितायेँ खास वर्ग हित को साधती हैं और सुन्दर होती हैं! 1956 के हार के बाद इतिहास फिर करवट ले रहा है, हमारे पक्ष में, हर छेत्र और हर जगह दिख रहा है!
Kavita Krishnapallavi
कविता में समस्त मानवता के लिए दु:खी-चिन्तित और उदास दिखने वाले सूफियाना मिजाज़ वाले कवि मुझे तो चालाक और पाखण्डी जान पड़ते हैं। जहाँ कुछ मनुष्य ही सामाजिक-राजनीतिक शक्तियों के रूप में मानवता के शत्रु हैं, जहाँ पूँजी की अंधी हवस पृथ्वी पर बहुसंख्यक जनों के ऊपर दिनरात हाड़तोड़ मेहनत, नर्क के तहखानों जैसी जिन्दगी, भुखमरी, बीमारी आदि-आदि के रूप में जुल्म की बरसात कर रही है और थोड़े से लोगों को तरह-तरह के वैभव-विलास के सरंजाम मुहैया करा रही है, वहाँ कविता से बेहद कलात्मक तराश के साथ आध्यात्मिक चिन्ताओं एवं सौन्दर्य-मीमांसाओं के बजाय मुखर होकर पक्ष लेने का आग्रह तो किया ही जाना चाहिए। समाज की तमाम कुरूपताओं को ''कुरूप'' क्रान्तियों से ही दूर किया जा सकता है और ''कुरूप'' कविताएँ ही ऐसे समय में ज़रूरी औजारों या रोजमर्रे की जिन्दगी में बरते जाने वाले सामानों की तरह काम आयेंगी।
अक्सर पाया जाता है कि कविता में जो कवि बहुत दु:खी, उदास, खिन्न, अन्यमनस्क और अतिसंवेदनशीलता के कारण मनुष्यता के तमाम दुखों को लेकर अवसादग्रस्त मुद्रा में दीखते हैं, जिन्दगी में वे व्यवस्थित, सुरक्षित, पुरस्कृत, सुविधा सम्पन्न और नितान्त व्यावहारिक होते हैं, यहाँ तक कि कई बार हिसाबी-किताबी, दंद-फंदी और तिकड़मी भी होते हैं।
जब लोगों के लिए जीवन विकट हो गया हो तो भाषाई खिलंदड़ापन कितना घिनौना लग सकता है, इसे सुधीश पचौरी की टिप्पणियों को पढ़कर जाना जा सकता है, शालीन-कुलीन-निष्कलुष कला-साहित्य विमर्श और प्रकृति वर्णन कितने शातिर और बेरहम लगते हैं, इसे अशोक बाजपेयी की अखबारी टिप्पणियों और प्रयाग शुक्ल के यात्रा-वृत्तांतों को पढ़कर जाना जा सकता है। प्रकाशकों के भव्य आयोजनों में पुस्तक-विमोचनों, पुरस्कार एवं सम्मान समारोहों में उपस्थित सुखी-संतुष्ट चेहरे बताते हैं कि साहित्य की दुनिया किस कदर गम्भीर रूप से बीमार है। कविता अपने समय-समाज से कटकर कितनी पाखण्डी और विकर्षक हो सकती है, यह हिन्दी कविता की मुख्य (चालू) धारा को देखकर ही समझा जा सकता है।
अक्सर पाया जाता है कि कविता में जो कवि बहुत दु:खी, उदास, खिन्न, अन्यमनस्क और अतिसंवेदनशीलता के कारण मनुष्यता के तमाम दुखों को लेकर अवसादग्रस्त मुद्रा में दीखते हैं, जिन्दगी में वे व्यवस्थित, सुरक्षित, पुरस्कृत, सुविधा सम्पन्न और नितान्त व्यावहारिक होते हैं, यहाँ तक कि कई बार हिसाबी-किताबी, दंद-फंदी और तिकड़मी भी होते हैं।
जब लोगों के लिए जीवन विकट हो गया हो तो भाषाई खिलंदड़ापन कितना घिनौना लग सकता है, इसे सुधीश पचौरी की टिप्पणियों को पढ़कर जाना जा सकता है, शालीन-कुलीन-निष्कलुष कला-साहित्य विमर्श और प्रकृति वर्णन कितने शातिर और बेरहम लगते हैं, इसे अशोक बाजपेयी की अखबारी टिप्पणियों और प्रयाग शुक्ल के यात्रा-वृत्तांतों को पढ़कर जाना जा सकता है। प्रकाशकों के भव्य आयोजनों में पुस्तक-विमोचनों, पुरस्कार एवं सम्मान समारोहों में उपस्थित सुखी-संतुष्ट चेहरे बताते हैं कि साहित्य की दुनिया किस कदर गम्भीर रूप से बीमार है। कविता अपने समय-समाज से कटकर कितनी पाखण्डी और विकर्षक हो सकती है, यह हिन्दी कविता की मुख्य (चालू) धारा को देखकर ही समझा जा सकता है।
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