अकेलापन
पहले डर लगता था अकेले रहने में
अब आदत सी हो गयी है अकेले रहने में
दोस्तों की भरमार, रैलमपेल थी, हर माहौल में
पर लगता है डर और घुटता है दम अब हर भीड़ में।
यह भीड़ नहीं हैं अजनबियों का
अनायास दर्शकों का, तमाशबीनों का
मगर आतंकवादियों का, खुद अपनों का
सुलझे हुए गद्दारों का, हत्यारौं, मक्कारों का।
भीड़ है कुछ खास मकसद के साथ
सरकार है इस "खास" मकसद के साथ
सब पैसे और खून के लिए पागल हो रहे हैं
लूट, दंगे, बलात्कार इनके हथियार बन गये हैं।
क्या भीड़ का मुकाबला भीड़ से
क्या डंडे का जवाब हम भी दें डंडे से
या फिर फासीवाद का मुकाबला क्रांति से
पूंजीवाद को नेस्तानाबुद करें समाजवाद से?
Nice one.
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