छटपटा रहा हूँ जिन्दा रहने के लिए,
जानवर नहीं, इंसान हूँ!
दो रोटी और एक छत के लिए,
शिक्षित हूँ, हुनर भी रखता हूँ,
पर काम नहीं है, सड़ता जा रहा हूँ!
सुना है, ज्यादा उत्पादन हो गया है,
जो सड रहे हैं, खलिहानों और भंडारों में,
जब बिकेंगे मुनाफे में तो मुझे भी कोई पूछेगा,
उम्मीद है जो टूट रहा है,
मुनाफा दर के घटते जाने से,
काम मिल जाता तो, मै भी मदद करता,
तुम्हारे 'बेशी मूल्य' और 'मुनाफा' बढ़ने में!
कम से कम जिन्दा तो रहता,
भले ही चलते फिरते लाश के रूप में!
लेकिन यह आर्थिक व्यवस्था होने नहीं देगी,
बेरोजगारी ख़त्म, मुनाफा जो घाट जायेया!
जानवर नहीं, इंसान हूँ!
दो रोटी और एक छत के लिए,
शिक्षित हूँ, हुनर भी रखता हूँ,
पर काम नहीं है, सड़ता जा रहा हूँ!
सुना है, ज्यादा उत्पादन हो गया है,
जो सड रहे हैं, खलिहानों और भंडारों में,
जब बिकेंगे मुनाफे में तो मुझे भी कोई पूछेगा,
उम्मीद है जो टूट रहा है,
मुनाफा दर के घटते जाने से,
काम मिल जाता तो, मै भी मदद करता,
तुम्हारे 'बेशी मूल्य' और 'मुनाफा' बढ़ने में!
कम से कम जिन्दा तो रहता,
भले ही चलते फिरते लाश के रूप में!
लेकिन यह आर्थिक व्यवस्था होने नहीं देगी,
बेरोजगारी ख़त्म, मुनाफा जो घाट जायेया!
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