Tuesday, 1 November 2016

खैनी का गुणगान

खैनी खाओ, जहाँ मुड बने थूके जाओ,
क्या फर्क पड़ता है, किसी का मुंह हो या थोबड़ा;
खैनी खाए जाओ, दूसरों की परवाह क्यूँ,
मजे लो, सस्ता भी है, नशा भी है,
पैसा ना हो तो मान्ग लो, मिल ही जायेगा,
दो 70 चुटकी, 80 ताल, फिर देख लो खैनी का चाल!

कैंसर जबड़े का?
तब देखा जायेगा,
समाज ने दिया यह नशा 10 की उम्र में,
दोस्तों से, कारखाना में, गलियों में,
ऑफिस में, जेल में!
दिमाग सुन्न है, कारन विलुप्त है,
बस वर्तमान नजर आता है,
जो बर्बाद हो चूका है!

भगवन पर भरोसा करो, खैनी खाओ,
मदिरा और सुट्टा भी लगाओ,
गन्दगी और बेचारगी फैलाओ,
देश भक्ति का नारा लगाओ,
जय हिन्द, जय भारत,
जय जवान जय किसान!

जय हो खैनी!
सुबह हो या शाम,
शौच से पहले, शौच के बाद,
नाश्ता से पहले, खाना के बाद,
गप करते समय, चुप रहते समय,
सिनेमा घरों में, बस और ट्रेन में!
उंगल का इस्तेमाल करो,
घुसेड़ो मुंह में या निकालों मुंह से,
खिड़की से बाहर, बिस्तर के बगल में!
खैनी खाओ, बनानेवाले को मालामाल बनाओ,
खुद बीमार, जाहिल रहो!
सामाजिक विघटन में सहयोग दो!
खैनी जिंदाबाद, पर तुम भी क्या जिंदाबाद हो?
वैसे भी फर्क नहीं पड़ता इसका समाज पे!

खैनी के कई रूप!
गुटका से गुड़ाकू तक,
बीडी से सिगरेट तक,
असर है जबड़े से फेफड़े तक,
कैंसर की गिरफ्त तक!

हाय रे मानवता,
दुसरे के मुनाफे के लिए,
खुद को लुटा रहे हो!
खैनी जिंदाबाद,
बेबस इन्सान मुर्दाबाद,
दोनों नहीं हो सकते जिंदाबाद,

इसलिए खैनी जिंदाबाद!

कृष्ण कान्त 

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