अब तक छिपे हुए थे उनके दाँत और नाख़ून ।
संस्कृति की भट्ठी में कच्चा गोश्त रहे थे भून ।
छाँट रहे थे अब तक बस वे बड़े-बड़े क़ानून ।
नहीं किसी को दिखता था दूधिया वस्त्र पर ख़ून ।
अब तक छिपे हुए थे उनके दाँत और नाख़ून ।
संस्कृति की भट्ठी में कच्चा गोश्त रहे थे भून ।
मायावी हैं, बड़े घाघ हैं, उन्हें न समझो मन्द ।
तक्षक ने सिखलाए उनको ‘सर्प नृत्य’ के छन्द ।
अजी, समझ लो उनका अपना नेता था जयचन्द ।
हिटलर के तम्बू में अब वे लगा रहे पैबन्द ।
मायावी हैं, बड़े घाघ हैं, उन्हें न समझो मन्द ।
(नागार्जुन)
नोट: यह आदमखोर यहाँ भी हो सकता है! हिटलर को हटाकर आरएसएस या मोदी लगाकर पढ़ें!
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