Friday, 9 December 2016

धरा को उठाओ, गगन को झुकाओ

दिए से मिटेगा न मन का अँधेरा,
धरा को उठाओ, गगन को झुकाओ !

बहुत बार आई-गई यह दिवाली
मगर तम जहाँ था वहीं पर खड़ा है,
बहुत बार लौ जल-बुझी पर अभी तक
कफन रात का हर चमन पर पड़ा है,
न फिर सूर्य रूठे, न फिर स्वप्न टूटे
ऊषा को जगाओ, निशा को सुलाओ !
दिए से मिटेगा न मन का अँधेरा
धरा को उठाओ, गगन को झुकाओ ! 
सृजन शांति के वास्ते है जरूरी
कि हर द्वार पर रोशनी गीत गाए
तभी मुक्ति का यज्ञ यह पूर्ण होगा,
कि जब प्यार तलवार से जीत जाए,
घृणा बढ़ रही है, अमा चढ़ रही है,
मनुज को जिलाओ, दनुज को मिटाओ!
दिए से मिटेगा... Read more at: http://hindi.webdunia.com/gopal-das-neeraj/%E0%A4%A7%E0%A4%B0%E0%A4%BE-%E0%A4%95%E0%A5%8B-%E0%A4%89%E0%A4%A0%E0%A4%BE%E0%A4%93-%E0%A4%97%E0%A4%97%E0%A4%A8-%E0%A4%95%E0%A5%8B-%E0%A4%9D%E0%A5%81%E0%A4%95%E0%A4%BE%E0%A4%93-108011700075_1.htm

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