Tuesday, 9 January 2018

क्या मैं जिंदा हूँ?

सुबह 6 बजे उठता हूँ,
रात 12 बजे ही बिस्तर में जा पता हूँ!
4 घंटे कार्यस्थल तक
आने जाने में लगाता हूँ,
14 घंटे मालिक के लिए खटता हूँ!
"सन्डे" को ओवर टाइम भी करता हूँ,
ताकि रोटी के साथ आलू, प्याज और
कुछ हरी सब्जी भी मिल जाये!
2 बच्चे "आधे" माँ के साथ,
बड़े हो रहे हैं, नए मजदूर के रूप में!
"आधी" माँ ही तो है,
बाकि आधे समय में,
दूसरों के घरों में मजदूरी करती है,
रोटी सब्जी के साथ,
दवा और "शिक्षा" के लिए!

सवाल आता है दिमाग में,
क्या जिंदा हूँ मै अपने लिए?
या फिर "अपने" परिवार के लिए?
या फिर उस परिवार के लिए,
जिसके लिए "मेरा" परिवार,
काम करता है,
आज भी और आने वाले कल भी!

क्या मैं जिंदा हूँ?
क्या मैं फिर से खोई ज़िन्दगी
वापस ला सकता हूँ?
अकेले ना सही,
पर उन करोड़ों जीवित
"लाशों" के साथ, जो मेरे
जैसे ही "जिंदा" हैं,
पर कहीं ना कही दिल में,
"विद्रोह" जिंदा है,
क्यूंकि वह जानवर नहीं,
बल्कि इन्सान हैं और
"बेशी मूल्य" के जन्मदाता!
मैं ना सही, पर मेरे बच्चे,
मजदूर बनने के बदले,
एक सही इंसान तो बनेंगे,
एक नए समाज में,
समाजवाद में!

क्या मैं जिंदा हूँ?
नहीं तो क्या जिंदा हो सकता हूँ?
जी हाँ, अब में देख रहा हूँ,
सवाल नहीं, बल्कि स्पष्ट हूँ,
"विद्रोह" कर, अपने वर्ग के
साथ जुड़ कर,
फिर से जिंदा हो सकता हूँ!
और अब मैं फिर से जिंदा हूँ!

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