झूठों और गद्दारों के बीच,
शोषकों, मक्कारों के बीच,
सिसकता मजदूर, किसान,
बच्चे, महिला, बुढ़े, जवान।
जनता को किया लहू-लुहान,
अट्ठाहस कर रहे सारे धनवान,
बहू बेटियों तक को ये छोड़ें न,
पुलिस, प्रशासन सब हैं हैवान।
हजारों, लाखों और करोड़ों हैं जन,
बहुमत में, पर एक दूजे से अनजान,
धर्म, जाति, रंगभेद, देश "उनकी" देन,
पकड़ लिया हमने जैसे अपनी ही "देन"।
क्या छुटकारा मिलेगा, ओए भगवान,
या यह भी है एक काल्पनिक पकवान?
रे साथी, मरना भी तो है एक जरूरी काम,
मरने से पहले क्यों न अमर करें अपना नाम?
सब एक ही नांव में, क्यों ना मिलें हम?
एक सी हालात, फिर भी बिखरे हैं हम,
धूर्त है दुश्मन, क्यों बुद्धू रह गए हम?
एक बार तो आजमा लें, अपना दम।
इंकलाब हो हमारा नारा,
और दूजा नहीं कोई चारा,
उठो, आगे बढ़ो, देना है बलिदान,
इस मुक्ति का रास्ता नहीं आसान।
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