हमारे हत्यारे
हमारे हत्यारे ढूंढ रहे थे हमें
जा पहुंचे उन्हीं के मयखाने में
नशे में धूत्त थे, सुपारी के पैसों में
पता न था पहुंच गये मौत के गोद में।
बांछें खिल गयीं, जब पहचाना हमें
हलाल से पहले, भर ली आगोश में हमें
बोला बहुत लम्बी उमर है, मुबारक दी हमें,
बताया बस अभी अभी तो याद कर रहे थे तुम्हें।
एक जाम भी सरकाया हमारे पीने के लिए
खुद लगाया जाम होठों से, ली घूंट मजे के लिए
और फिर सिखाई मुझे तरजीह, जाम पीने के लिए
बोला, जाम उठा, बोलो "तुम्हारी लम्बी उम्र के लिए"।
पता चला, कातिल भी वही, मुंसिफ भी वही
भाग्य भरोसे छोड़, लगा ली मैंने भी दो चार वहीं
नशा टूटा, नींद टूटी जैसे ही विदेसी मुर्गे ने बांग दिया
क्या फर्क पड़ता है, जिंदगी बची और मुफ्त में देसी पिया।
No comments:
Post a Comment