Monday, 2 May 2016

ग़ज़ब की आफ़त आई है

न पानी है , न बिजली है ; न रोटी , ना दवाई है
कहर सी आफ़त है भाई , गज़ब की आफ़त आई है।
भरे गोदाम हैं सारे
मरें हम भूख के मारे
इधर पसरा हुआ सूखा
उधर चलते हैं फव्वारे
यहाँ के अस्सी फीसद आदमी के घर उदासी है
हमारे चेहरों पे फैली हुई बस बदहवासी है
महज कुछ फीसदी के चेहरे पे रौनक , ललाई है ।
न पानी है , न बिजली है .....
समूचे मुल्क का अब हाल
बेतरतीब दिखता है
ये कैसा रहनुमा है
मौत का कॉन्ट्रैक्ट लिखता है
करोड़ों और अरबों ऊपर-ऊपर ग़ुम हो जाता है
हमारी लाशों के मलबों का उनसे गहरा नाता है
खुली है लूट या फिर हाथ की शातिर सफाई है ।
न पानी है , न बिजली है.....
तरक्की ऐसी कि अब हर इलाका
उजड़ा - उजड़ा है
इधर से मानो छुट्टा साँढ़
सबकुछ चरते गुजरा है
पनामा है , हवाई है , दीवाला है , हवाला है
सब इनके बाप का है , कौन क्या अब कहनेवाला है
जहां था कांग्रेसी , आज बैठा भाजपाई है ।
न पानी है , न बिजली है.....
अगर बीमार पड़ जाओ
तो बस भगवान को गाओ
इलाज होने के पहले
बर्तन-बासन बेच कर आओ
हमारा आज संकट में है और भवितव्य अँधा है
यहाँ तो फूलता - फलता महज दौलत का धंधा है
कि सब लुट जाता है ,बचती सिरिफ सिसकी,रुलाई है ।
न पानी है , न बिजली है .....
यहाँ परदे में इज़्ज़त
लूट ली जाती है घर घुस के
यहाँ बेटी - बहन से
कहा जाता है चलो झुक के
हमारे मुल्क की ताज़ा हवाएँ सूलियों पर हैं
यहाँ पंचायतों से दिए जाते फतवे बर्बर हैं
यहाँ हर बात पर रस्मों - रिवाज़ों की दुहाई है
न पानी है , न बिजली है .....
यहाँ दंगों से अब तो
हर सियासी खेल सजता है
गज़ब है ढोंग , हत्यारा ही
जनता-नाम भजता है
हरेक तक़रीर में नफ़रत भरी है ख़ूनी स्याही से
डरा - सहमा हुआ है आज भाई अपने भाई से
अरे , शासन है या कि कोई जालिम आतताई है ।
न पानी है , न बिजली है .....
यहां सबकुछ है , पूरा है
मगर है यार कब्ज़े में
जमीं उनकी , हरेक औजार
सब हथियार कब्ज़े में
उन्हीं का माल , सब असबाब , हर बाज़ार कब्ज़े में
इधर हम कसमसाते , चीखते बेजार कब्ज़े में
उठो , कब्ज़ा करें अब हम ; ये कब्ज़े की लड़ाई है
न पानी है , न बिजली है , न रोटी ,ना दवाई है
कहर सी आफ़त है भाई , गज़ब की आफ़त आई है।
----- आदित्य कमल

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