मेरी जंग उन लोगों के खिलाफ है जिन्हे कटे हुए हाथों का अभिनंदन पसंद है
मेरी जंग उन लोगों के खिलाफ है जिनकी तिजोरियों मे मज़दूरों और किसानो के सपने गिरवी रकखे है
मैने ये क्रांति के दीप उन अंधेरों को चीरने के लिए जलाए है जहाँ देश का अंतिम आदमी अंधेरों टटोलता फिरता है रोशनी की एक किरण
मैं बंधुवा किसानो के हाथों से हल चीन कर बँदूक़ थमा देना चाहता हूँ जो पेट भर रोटियाँ खाने के एवज़ मे भर पेट लाठी खाते हैं
मैं ग़रीब मज़दूर किसानो की बेटियों को बूँद बूँद ज़हर देकर विषकन्या बना देना चाहता हूँ जो सफ़ेदपोश ज़मीदारों की अययाशियों की लार मे नहाई रहती हैं
मेरी जंग उन लोगों के खिलाफ है जिनकी तिजोरियों मे मज़दूरों और किसानो के सपने गिरवी रकखे है
मैने ये क्रांति के दीप उन अंधेरों को चीरने के लिए जलाए है जहाँ देश का अंतिम आदमी अंधेरों टटोलता फिरता है रोशनी की एक किरण
मैं बंधुवा किसानो के हाथों से हल चीन कर बँदूक़ थमा देना चाहता हूँ जो पेट भर रोटियाँ खाने के एवज़ मे भर पेट लाठी खाते हैं
मैं ग़रीब मज़दूर किसानो की बेटियों को बूँद बूँद ज़हर देकर विषकन्या बना देना चाहता हूँ जो सफ़ेदपोश ज़मीदारों की अययाशियों की लार मे नहाई रहती हैं
मेरे अंदर की आग उन खद्दर धारियों की पोशाक़ो को जला देना चाहती है जो देश की सवा सौ करोड़ लोगों को लोकतंत्र के नाम पर सपने बेंच रही है
मैने ये गड्ढे उन लोगों को संगसार करने के लिए खोदे हैं जिनके दिमाग़ों मे दंगा कराने की खूनी साज़िशें रेंग रही हैं
मैं उन लोगों को शक्कर के शीरे मे डुबो कर छींटी और छींटों की खुराक बना देना चाहता हूँ जो इंसान को इंसान नहीं बनने देते
जब जनवरी ठंडी रात मे कोहरे मे लिपटे झोपडे मे कोई नाजायज़ बच्चा पैदा होता है तब मुझे लगता है कि और नॅक्सलाइट पैदा हो गया
जब जनवरी ठंडी रात मे कोहरे मे लिपटे झोपडे मे कोई नाजायज़ बच्चा पैदा होता है तब मुझे लगता है कि और नॅक्सलाइट पैदा हो गया
और जब कभी मैं जेठ की तपती हुई दोपहर मे किसी आदिवासी बच्चे को जंगल की किसी घनी झाड़ी की छावो मे कुल्हाड़ी को पत्थर पर रगड़ते हुए देखता हूँ तो मुझे उसकी कुल्हाड़ी से उठती हुई लोह गंध मे एक परिवर्तन का अहसास होता है मुझे लगता है आज ये कुल्हाड़ी जंगल की किसी शाख पर गिरेगी और कल अपने नाजायज़ बाप की गर्दन के ऊपर!
मेरी टिपण्णी:
आग है इन पंक्तियों में! "मैं बंधुवा किसानो के हाथों से हल चीन कर बँदूक़ थमा देना चाहता हूँ जो पेट भर रोटियाँ खाने के एवज़ मे भर पेट लाठी खाते हैं"! यह आपने 1988 में लिखी है! केवल जवानी का जज्बा नहीं बल्कि जमीं से जुड़ने का और सताए हुए किसान और मजदुर के साथ का अनुभव और विद्रोह है! वर्ग संघर्ष और एकता फिर वर्ग संघर्ष और एकता तबतक जबतक इन अपराधी परजीवियों को परास्त नहीं करते, जबतक हम अपनी सत्ता नहीं कायम करते! विजय हमारी है! वर्ग संघर्श से वर्ग विहीन समाज बनायेंगे! सलाम कॉमरेड!
मेरी टिपण्णी:
आग है इन पंक्तियों में! "मैं बंधुवा किसानो के हाथों से हल चीन कर बँदूक़ थमा देना चाहता हूँ जो पेट भर रोटियाँ खाने के एवज़ मे भर पेट लाठी खाते हैं"! यह आपने 1988 में लिखी है! केवल जवानी का जज्बा नहीं बल्कि जमीं से जुड़ने का और सताए हुए किसान और मजदुर के साथ का अनुभव और विद्रोह है! वर्ग संघर्ष और एकता फिर वर्ग संघर्ष और एकता तबतक जबतक इन अपराधी परजीवियों को परास्त नहीं करते, जबतक हम अपनी सत्ता नहीं कायम करते! विजय हमारी है! वर्ग संघर्श से वर्ग विहीन समाज बनायेंगे! सलाम कॉमरेड!
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