खत्म होगा मालिक पे एतबार?
बहुत हुआ बराबरी का नाटक
कानून के बराबरी का नाटक
धर्मनिरपेक्ष जाति विहीन ढोंग
और प्रजातंत्र, न्याय का ढोंग।
अनपच हो गया है मझे जुमलों से
खाली पेट में उठते सुखे मरोड़ों से
झूठ देशी और विदेशी बकवासों से
मक्कारी, बलात्कार और जुल्मों से।
खत्म हो रहा मेरा सब सपना
बच्चों का खेलना और पढ़ना
बढ़ा बुढ़ों का दर्द से कराहना
औरतों की इज्जत से खेलना।
छलकेगा तेरे सब्र का घड़ा कब
टूटेगा भ्रम का मकड़जाल कब
खत्म होगी अकेलेपन की दीवार
और हत्यारे मालिकों पे ऐतबार?
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