अपने लिए तो लड़ता ही रहा हूँ
अपने लिए ही तो लड़ता रहा हूं
बचपन से अधेड़ावस्था, खुद के लिए
कभी दूध के लिए, तो कभी दारू के लिए
रोजगार के लिए, तो कभी नाम कमाने के लिए।
दायरा बढ़ा भी तो परिवार के लिए
कभी दोस्तों और खुद के मस्ती के लिए
चौराहे पर भीख मांगते बच्चों, छक्कों के लिए
पर हमेशा, गम हो या खुशी, सिर्फ मालिकों के लिए।
चमचागिरी तो भरी थी मेरे खून में
पहली कक्षा से अच्छी नौकरी पाने में
महिने के पहले दिन से पगार मिलने तक में
जरूरत पड़े तो दोस्तों के साथ घात तक करने में।
दास बन कर रह गया था पूंजी के गुलामी में
बचपन से जवानी तक के शिक्षा और अपने में
बुढ़ापे में आंखें तो खुली, पर खुली क्या वास्तव में
क्या रास्ता बदली जा सकती है, अब इस बचे जवानी में?
Good one!
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