Thursday, 24 September 2020

गमों का पहाड़? : यहीं पे लड़ना है!!

 गमों का पहाड़?

गमों का पहाड़ तो नहीं टूटा है
पर अंतहीन टीले हैं कतारों में।
जब भी सम्भालता हूं दो चार को
दर्जनों खड़े हो जाते हैं कतार में।
सुझाव एक चतुर ज्योतिष का
ग्रहों को सीधा करवा लेने का।
पुछा सितारों का क्या बहुतेरे हैं
जो हर घर में दो चार सौ बैठे हैं?
ध्यानमग्न बाबा ने समझाया
बाहर देखना बंद कर, माया है।
अपने ही अंतर्मन का दर्शन कर
समस्या का वहीं पे समाधान है।
पर सरकार के डंडे, पेट का भूख
अंदर बाहर दोनों ही याद दिलाते हैं।
पहाड़, टीले, भूख, बिमारी असली हैं
इसी लोक में रहना है, यहीं पे लड़ना है।

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