सड़क पे जींदगी
एक सड़क आ रही थी, जा रही थी
पता नहीं कहाँ से, पर गतिमान थी।
घोड़ा बकरी, बैल गाड़ी चल रहा था
धूल से, दिन में शाम सा नजारा था।
चौराहे पर लाल बत्ती गुल था
सुबह शाम में ढल चुका था।
रेलमपेल बेकाबू हो चुका था
सड़क बहुत तेज हो चला था।
अचानक हुआ, ब्रेक की आवाज
धक्का, चिखने, दर्द की आवाज।
फिर शांति, पुलिस गाड़ी की आवाज
और एम्बुलेंस के सायरन की आवाज।
रोज की कहानी, पुरानी है
आम जनता, आम मौत है।
सड़क आ रही है, जा रही है
जनता आ रही है, मर रही है।
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