भिन्न-भिन्न रुप
कोई दाढ़ीवाला है, तो कोई तिलकधारी
कोई सुट बूट वाला, तो कोई लंगोटधारी
कोई टोपी वाला है, तो कोई खड़ाउधारी।
पर भगवान, अल्लाह, गौड सबका एक
पैसा वाला मालिक भी तो सबका है एक
बाहर से अनेक, पर अंदर से सब हैं एक।
हम सब बंदर, मदारी हो गये हैं सब एक
हिंदू मुसलमान, सिख इसाई, बने अनेक
लूट रहे हैं, पर खुश हैं, लूट रहे हैं अनेक।
क्या हो सकते हैं हम सब फिर से एक
दुश्मनों को कर दें नेस्तानाबुद, परस्त
हो हमारा आज और कल हमारे हाथ।
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